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'वाह ताज' रिव्यू: वाजिब विषय पर बनी हल्की फिल्म

विशाल ठाकुर First Published:23-09-2016 04:11:18 PMLast Updated:23-09-2016 04:11:18 PM
'वाह ताज' रिव्यू: वाजिब विषय पर बनी हल्की फिल्म

कुछ महीने पहले जारी हुए इस फिल्म के पोस्टर को देखकर उत्सुकता हुई थी। पोस्टर में दर्शाया गया था कि 'ताज महल' पर किसी तुकाराम का कब्जा हो गया है, जिसने इसे बंद करने की धमकी दी है। बाद में पता लगा कि ये तो किसी फिल्म का पोस्टर है। अब जब फिल्म सामने है तो लगता है कि वो उत्सुकता सही ही थी, क्योंकि फिल्म की कथा-वस्तु वाकई ऐसी है कि एक बारगी तो लगता है कि शाहजहां के इस ताज महल पर वाकई किसी तुकाराम का कब्जा जायज है। लेकिन असल में ऐसा कुछ है नहीं।

ये कहानी है 'तुकाराम रावसाहेब मराठे' (श्रेयास तलपड़े) की, जो आ पहुंचा है 'आगरा'। अपनी पत्नी सुनंदा (मंजरी फडणिस) और आठ साल की बेटी लक्ष्मी के साथ तुकाराम आगरा के ताज महल पर अपना कब्जा साबित करने आया है, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इस खबर को सुर्खियां बनने में देर नहीं लगती और देखते ही देखते प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर तमाम पुलिस अधिकारियों और अफसरों की कुर्सी हिल जाती है। मामला अदालत पहुंचता है, जहां अपने तथ्यों और तर्कों से तुकाराम ये साबित कर देता है कि ताज महल जिस जमीन पर बना है वो उसके पुरखों की है और ये जमीन खुद शांहजहां ने उसके दादा परदादाओं को दी थी।

तुकाराम द्वारा सिलसिलेवार ढंग से पेश किए गए सबूतों के आधार पर और तुकाराम की गुजारिश पर अदालत ये फैसला सुनाती है कि जब तक प्रशासन द्वारा इस समस्या का हल नहीं निकल जाता तब तक ताज महल बंद रहेगा। तुकाराम की इस पहली कामयाबी से तमाम लोग जल-भुन जाते हैं और सियासी खेल खेलकर उसे इस आंदोलन से हटाने की साजिश रचने लगते हैं। ऐसे ही एक खेल में प्रदेश का जेल मंत्री विर्सजन यादव (हेमंत पांडे) तुकाराम को ऑफर देता है कि वह ताज महल की जमीन छोड़ कर देश में कहीं भी, किसी भी स्थान पर अपनी मांग के अनुसार जमीन ले सकता है।

तुकाराम मान जाता है और महाराष्ट्र के पास एक गांव की जमीन को अपने नाम करने को कहता है। विर्सजन यादव और तमाम लोग इस बात से खुश हो जाते हैं कि चलो उनके सिर से तो बला टली। लेकिन ये जमीन देश के एक सबसे बड़ी उद्योगपति के पास है, जो इस पर हजारों करोड़ रुपये का एक प्रोजेक्ट लगाने वाला है। सियासी घमासान फिर शुरू हो जाता है और घटनाक्रम कुछ ऐसे करवट लेता है कि तुकाराम की जान पर बन आती है। उसे गोली मार दी जाती है।

बेशक, यह फिल्म यहीं तक उत्सुकता बनाए रखती है, क्योंकि इसके बाद की तमाम बातें इसे एक आम बॉलीवुड फिल्म के खोल में फिट कर देती हैं। दरअसल इस कहानी के पीछे निर्देशक का मकसद देश में हो रहे भूमि अधिग्रहण के मसले को रौशनी में लाना है। निर्देशक ने ये भी दिखाया है कि किस तरह से भोले-भाले किसानों को लालच देकर या धमका कर उनकी जमीनें हथिया ली जाती हैं। लेकिन इस तरह के मुद्दे के लिए ये कहानी बस एक पल के लिए ही अपील करती है। आप इसे लेकर दूर तक नहीं जा सकते। इसमें मारक क्षमता न के बराबर है।

यहां सबसे बड़ी कमजोरी लेखन में नजर आती है। पटकथा कहीं से भी प्रभावी नहीं लगती। सीधे-सपाट संवादों पर भावहीन अभिनय फिल्म को बोझिल बना देता है। भूमि अधिग्रहण मुद्दे पर चोट करने वाली कहानी होनी चाहिए थी, न कि एक ऐसी मनोरंजक कहानी, जिसके आधे से ज्यादा हिस्से में हंसी-ठिठोली पनप रही हो। इसलिए एक वाजिब विषय और मुद्दा होने के बावजूद ये फिल्म प्रभाव नहीं छोड़ पाती।

श्रेयास तलपड़े चूंकि मराठी हैं तो उन पर ये किरदार जमा है। लेकिन वह औसत अभिनय ही कर पाए हैं। बाकी किरदार भी बेअसर से दिखते हैं। पता नहीं राजेश शर्मा जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता ने यह फिल्म क्या सोच कर की, जबकि उनका रोल तो हेमंत पांडे से काफी छोटा है। अदालत में तथ्यों को सही साबित करना एक पल तो ठीक लगता है, लेकिन जब असलियत सामने आती है तो हंसी छूट पड़ती है।


रेटिंग 1.5 स्टार
कलाकार: श्रेयास तलपड़े, मंजरी फडणिस, हेमंत पांडे, राजेश शर्मा, राजीव वर्मा, राकेश श्रीवास्तव, प्राची पाठक, युसुफ हुसैन
निर्देशक : अजित सिन्हा
लेखक: एम. सलीम
निर्माता: पवन शर्मा, अभिनव शर्मा
संगीत: विपिन पटवा, जयदेव कुमार, गौरव दगांवकर

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Web Title: film review wah taaj
 
 
 
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