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Film Review: जानें कैसी है रितेश देशमुख की 'बैंजो'

विशाल ठाकुर First Published:23-09-2016 04:33:11 PMLast Updated:23-09-2016 04:33:11 PM
Film Review: जानें कैसी है रितेश देशमुख की 'बैंजो'

मराठी फिल्मों में युवा पीढ़ी के निर्देशकों की फेहरिस्त में 'रवि जाधव' का नाम काफी गर्मजोशी से लिया जाता है। वजह साफ है कि उनकी फिल्में न केवल मान-सम्मान पाती रही हैं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी अब अच्छी कमाई करने लगी हैं।

35 करोड़ रुपये का कलेक्शन और 40 अवार्ड्स बटोरने वाली उनकी फिल्म ‘टाइमपास’ को कौन भूल सकता है। ऐसे निर्देशक को बॉलीवुड कैसे छोड़ सकता है, जिसकी गिरफ्त में दर्शकों की नब्ज भी हो और बॉक्स ऑफिस पर कब्जा करने की ताकत भी। इसी वजह से हिन्दी फिल्मों में उनकी एंट्री हुई है। लेकिन क्या ‘बैंजो’ में रवि जाधव के स्टाइल की झलक देखने को मिलती है? क्या जिस नब्ज के कमाल को उन्होंने मराठी फिल्मों में अब तक भुनाया है, उसे वह बॉलीवुड में भी भुना पाएंगे? 'ये क्या' और 'क्यों' जैसे सवाल उनकी इस फिल्म को देख कर उठना लाजिमी हैं, क्योंकि पहली नजर में तो ‘बैंजो’ आंशिक रूप से बस कहीं-कहीं ही असर करती है।

ये कहानी है मुंबई की मलिन बस्ती में रहने वाले चार युवकों की, जो 'बैंजो पार्टी' के नाम से मशहूर हैं। इनका लीडर है तराट (रितेश देशमुख), जिसकी उंगलियों में जादू है। वह जब बैंजो बजाता है तो दुनिया झूम उठती है। इनमें दूसरा ग्रीस (धर्मेश येलंडे) जो है तो मैकेनिक लेकिन ड्रम खूब बजाता है। तीसरा साथी पेपर (आदित्य कुमार) ढपली बजाता है और चौथा साथी वाजा, ताशा देखते ही झूम उठता है। गणपति पूजा और नवरात्र के दिनों में ये चारों यहां-वहां गा बजाकर कुछ पैसे कमा लेते हैं। वैसे तराट का असली धंधा वसूली है, जो वह क्षेत्रिय विधायक के लिए करता है।

एक दिन अमेरिका से 'क्रिस' (नरगिस फाखरी) नामक युवती इन्हें ढूंढते हुए आती है। क्रिस एक डिस्क जॉकी है और अब अपना संगीत बनाना चाहती है। कुछ अलग करने की चाह में क्रिस को इन चारों की तलाश है। क्रिस को तराट द्वारा संगीतबद्ध एक धुन उसके दोस्त माइकी (ल्यूक केनी) ने भेजी थी, तभी से वह इन चारों से मिलना चाहती है। लेकिन जब क्रिस मुंबई आती है तो उसके पास इन चारों का कोई पता ठिकाना नहीं होता। वह मुंबई की बस्तियों में इन्हें ढूंढने लगती है और किसी तरह से उसकी मुलाकात तराट से हो ही जाती है। लेकिन पहली मुलाकात में तराट, क्रिस को यह नहीं बताता कि वह बैंजो बजाता है। क्रिस भी काफी समय तक उसकी असलियत नहीं जान पाती, लेकिन एक दिन निराश हो कर क्रिस वापस अमेरिका जा रही होती है तो उसे तराट की असलियत पता चल जाती है। वह इन चारों को लेकर एक बैंड का गठन करती है और इन्हें एक नामी पब में परफार्म कराने ले जाती है, जहां तराट और उसके साथियों का संगीत काफी पसंद किया जाता है। क्रिस और तराट का बैंड आगे कुछ कर पाता इससे पहले एक घटना हो जाती है, जिसकी वजह से तराट और उसके साथियों को जेल हो जाती है, क्रिस का सपना टूट जाता है और वो वापस अमेरिका चली जाती है।

बेशक, ये कहानी कोई बहुत ज्यादा संभावनाएं और उत्सुकताएं नहीं जगाती। जमीन से उठ कर कुछ दिखाने वालों की जिंदगी में ऐसा ही होता है। कोई अचानक से उनकी जिंदगी में आता है, अपना हाथ बढ़ाता है और फिर वो आसमां छूने लगते हैं।

गीत-संगीत पर बनी हालिया फिल्मों की बात करें तो ‘एबीसीडी’ और ‘एबीसीडी 2’ इसका अच्छा उदाहरण है। पूर्व में ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिलते हैं। तो ‘बैंजो’ की कहानी में ऐसा क्या है, जिसके लिए सवा दो घंटे तक सिनेमाहाल में बैठा जाए? ऊपर से रितेश देशमुख जैसे अभिनेता, जो अपने कंधों पर फिल्म को सिरे चढ़ाने के लिए नाकाफी लगते हैं। नरगिस फाखरी, जिनकी अंग्रेजीनुमा हिन्दी के आगे बस हंसी ही आती रहती है। अब तो कैटरीना कैफ भी ठीक से हिन्दी बोलने लगी हैं। क्रिस का किरदार काफी भटका हुआ सा है। अंत तक ये साफ ही नहीं हो पाता कि उसे किस तरह के संगीत की तलाश है। और अंत में जिस तरह के संगीत को वह पसंद करती है, उसमें बैंजो का स्कोप न के बराबर दिखता है।

दरअसल रवि जाधव ने इस फिल्म को किरदारों के सूक्ष्म चित्रण से सजाने-संवारने की कोशिश की है। ऐसा वह अपनी मराठी फिल्मों में करते रहे हैं, जिसके लिए उन्हें सराहा भी गया है। लेकिन इस फिल्म में वह किसी बोझ तले दबे से दिखते हैं। मानो उन पर किसी बड़े एवं नामी प्रोडक्शन हाउस का बोझ हो या फिर नामचीन सितारों का। हालांकि उन्होंने रोचक किरदार गढ़ने की पूरी कोशिश की है।

मजे की बात है कि तराट से परे उसे यार-दोस्त ज्यादा रोचक लगते हैं। मसलन, पेपर को चौबीसों घंटे पानी भरने की चिंता रहती है और वाजा को बस हवाई जहाज में इसलिए बैठना है कि वहां बटन दबाने से एक लड़की आती है तो आपकी हर इच्छा पूरी करती है। ग्रीस को हर सफेद चीज पसंद है, क्योंकि वह इतना काला है कि अंधेरे में दिखाई नहीं देता। ग्रीस का अंग्रेजी की टांग तोड़ना गुदगुदाता है।

इनके बीच तराट का किरदार केवल हीरो के माफिक संवाद बोलने वाला, मारपीट करने वाला और इमोशनल होकर नशे में धुत्त होने वाला किरदार दिखता है। ऐसा तो शाका (धर्मेन्द्र फिल्म फूल और पत्थर में, 1966) भी था। ये अदा तो 'एंग्री यंग मैन' के पास भी थी। तो तराट में नया क्या है? और अब तो शाका एवं 'एंग्री यंग मैन' भी बदल चुके हैं।

मोटे तौर पर फिल्म की आत्मा संगीत होनी चाहिए लेकिन फिल्म में कोई एक गीत ऐसा नहीं है जो जबान पर चढ़ सके। हां, फिल्म देखते समय बेशक ये गीत-संगीत कुछ देर के लिए अच्छा लग सकता है, लेकिन इसमें ‘रॉक-ऑन’ जैसी धमक और रवानगी नहीं है। ऐसा लगता है कि विशाल-शेखर ने बैंजो की धुन पर पूरी लगन से काम नहीं किया। बैंजो के नाम से सुभाष घई की फिल्म ‘कर्मा’ (1986) याद आती है, जिसमें बैंजो की धुन पर एक प्रसिद्ध देशभक्ति गीत बनाया गया था।

कुल मिला कर यह फिल्म केवल अपने विचार, इरादों, विषय और सोच के कारण उत्सुकता तो पैदा करती है, लेकिन अपने बेहद औसत ट्रीटमेंट और साधारण अभिनय की वजह से निराश भी करती है। फिल्म में बस कुछेक पल और दृश्य ही ऐसे हैं, जहां मजा आता है, दिल करता है कि थोड़ी देर और बैठ जा...

रेटिंग 2 स्टार
कलाकार: रितेश देशमुख, नरगिस फाखरी, धर्मेश येलंडे, आदित्य कुमार, ल्यूक केनी, मोहन कपूर
निर्देशक : रवि जाधव
निर्माता: कृषिका लुल्ला, वाशु भगनानी
लेखक-संवाद: कपिल सावंत, रवि जाधव, निखिल मल्होत्रा
संगीत: विशाल-शेखर
गीत : अमिताभ भट्टाचार्य

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Web Title: banjo film review
 
 
 
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