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वाम दलों के पास यूपी के मध्यम वर्ग लायक कोई ब्लू प्रिंट नहीं

वाम दलों के पास यूपी के मध्यम वर्ग लायक कोई ब्लू प्रिंट नहीं

यूपी में वामपंथ के विकास में सबसे बड़ी बाधा है उसका उदीयमान मध्यवर्ग से अलगाव। आजादी के बाद यूपी में पैदा हुए मध्यवर्ग की प्रकृति और उसकी राजनीतिक-बौद्धिक-पेशेवर क्षमताओं को समझने व उनके अनुकूल अपने क्रांतिकारी औजारों को निर्मित करने में वाम पूरी तरह असमर्थ रहा है। वहां सपा-बसपा-भाजपा का नया उभार इसलिए संभव हुआ, क्योंकि इन दलों ने सही ढंग से मध्यवर्ग को पकड़ा। यह सही है कि बुर्जुआ दलों का जो लक्ष्य है, वह लक्ष्य वाम दलों का नहीं हो सकता। पर यह एक वास्तविकता है कि वाम के पास यूपी के मध्यवर्ग को आकर्षित करने का कभी कोई ब्लू प्रिंट नहीं रहा।

यूपी के मध्यवर्ग को अपनी ओर खींचने के लिए जिस तरह की व्यापक सांस्कृतिक-सामाजिक समझ चाहिए, वह भी कम्युनिस्ट नेतृत्व विकसित नहीं कर पाए, इसके विपरीत यह देखा गया कि कम्युनिस्ट नेताओं व कार्यकर्ताओं में मध्यवर्ग के प्रति, खाते-पीते लोगों के प्रति मन ही मन एक खास किस्म की नफरत है। इसे बनाए रखने में वाम नेताओं ने नकारात्मक भूमिका निभाई है। दिलचस्प बात यह है कि वाम का अधिकांश नेतृत्व मध्यवर्ग से आता है, पर मध्यवर्ग को आकर्षित करना नहीं जानता। आखिर क्यों? मेरा मानना है कि फिलहाल वाम के पास जो मध्यवर्गीय कॉमरेड हैं, इनमें से अधिकतर वे हैं, जिनकी मध्यवर्ग में कोई साख नहीं है, कोई सर्जनात्मक/वैचारिक पहचान नहीं है। रद्दी किस्म के मध्यवर्गीय लोगों को लेकर आकर्षित करने की क्षमता पैदा नहीं की जा सकती।
जगदीश्वर चतुर्वेदी की फेसबुक वॉल से
 

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