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अब भी मुख्यधारा से दूर हैं UP के दलितः वरुण गांधी

अब भी मुख्यधारा से दूर हैं UP के दलितः वरुण गांधी

छुआछूत का पारंपरिक दोष आज भी हमारे समाज में कायम है। अब भी इसकी जडे़ं गहरी हैं। अलग-अलग श्रेणियों व पायदानों के बहाने समाज के लाखों लोगों को उन कामों में रमने को मजबूर किया गया, जिन्हें आमतौर पर कलंक माना जाता है। उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया। आजादी के बाद भारत छुआछूत को खत्म करने को आगे बढ़ा था। सांविधानिक प्रावधान के तहत 1950 में अनुसूचित जातियों की सूची तैयार की गई, ताकि उन लोगों तक विकास व सरकारी नीतियों की रोशनी पहुंचाई जा सके। सुधारवादी काम किए गए, केंद्र व राज्य विधानमंडलों, सिविल सेवा और शैक्षणिक संस्थानों में उन्हें आरक्षण दिया गया।

मगर, सच यही है कि दलित आज भी दूसरे तमाम समुदायों की तुलना में ज्यादा गरीब हैं। आज भी 36 फीसदी ग्रामीण दलित गरीबी रेखा से नीचे हैं। असंगठित श्रम में भी उनकी भागीदारी काफी ज्यादा है। 41 फीसदी दलित पुरुष और करीब 20 फीसदी दलित महिलाएं असंगठित कामगार हैं, जबकि गैर-अनुसूचित जाति/ जनजाति पुरुषों में यह आंकड़ा 19 फीसदी व महिलाओं में महज आठ फीसदी है। बमुश्किल 13 फीसदी दलित पुरुष ही ऐसे रोजगार में हैं, जहां से उन्हें नियमित तनख्वाह मिलती है।

ऐसे में, हमारी सरकार को दलित सशक्तीकरण को बढ़ावा देना चाहिए, और इसके लिए सामाजिक व्यवहार और संस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। जरूरत शिक्षा पर भी ध्यान देने की है। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार, दलित बच्चों में ड्रॉप-आउट (पढ़ाई बीच में छोड़ देना) काफी ज्यादा है। आंकडे़ बताते हैं कि 74 फीसदी दलित लड़के और 71 फीसदी दलित लड़कियां प्राथमिक व मध्य विद्यालयों की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। साल 1931 में प्राथमिक स्कूलों में दलित बच्चों के दाखिले की दर सिर्फ चार फीसदी थी। दलित बच्चों की प्रतिभा को आज भी हतोत्साहित किया जा रहा है। मध्य उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव में हुआ एक दिलचस्प प्रयोग बताता है कि जिन दलित छात्रों ने पहेलियों को सुलझाने में पहले बेहतर प्रदर्शन किया था, वे तब बुरी तरह विफल रहे, जब उनकी जाति का पहले खुलासा कर दिया गया।

गरीबों और दलितों के प्रति भेदभाव दूर हो, इसके लिए वंचित घरों के बच्चों को बेशक मुफ्त में किताबें या विश्वविद्यालयों में मुफ्त होस्टल की सुविधा दी जा रही है, मगर इन प्रयासों से गरीबी और भेदभाव के खत्म होने में लंबा वक्त लग सकता है। जरूरत है ऐसे छात्रों को बुनियादी सुविधाएं, मसलन बिस्तर, टेबल-कुरसी आदि दिए जाएं। इससे शिक्षा अधिक समावेशी होगी। इसके अलावा, स्कूलों में बच्चों को कीडे़ मारने की दवा मुफ्त खिलानी चाहिए, ताकि उनकी सेहत दुरुस्त रहे। इससे कक्षा से उनके अनुपस्थित रहने की दर कम होगी और दलित बच्चों के नामांकन की दर बढे़गी।

दलित उद्यमिता भी एक बड़ा मुद्दा है। आज भी दलित उद्योगपति काफी कम हैं, क्योंकि ज्यादातर दलित पारंपरिक पेशों में ही लगे हुए हैं। वैसे, इन उद्यमियों को भी भेदभाव रहित सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल नहीं है। देश का मानव विकास सर्वे कहता है कि महज 12 फीसदी दलित परिवारों की पहुंच मुख्यधारा से जुड़े दो-तीन उद्यमों तक है, जबकि उच्च वर्गों में यह आंकड़ा 26 फीसदी है। भेदभाव, भूमिहीन होने का इतिहास, सामाजिक दबाव और नगण्य भागीदारी जैसी चीजें दलित उद्यमिता की राह की बाधाएं हैं।

इस स्थिति में गांव और राज्य के स्तर पर सुधार की दरकार है। हमें महाराष्ट्र से सीखना चाहिए। वहां अनुसूचित जाति-जनजाति के कारोबारियों के लिए महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम के अधीन क्षेत्रों में 10 फीसदी जमीन आरक्षित कर दी गई है। यानी पूंजी की समस्या तभी दूर हो सकती है, जब दलित उद्यमिता को ध्यान में रखते हुए अधिक से अधिक ‘सोशल इंपैक्ट फंड’ के रास्ते खोले जाएं। हमें उद्यमिता केंद्रों के विस्तार के बारे में भी सोचना चाहिए, जिसमें पूंजी को बढ़ावा देने और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खासा जोर हो। एक समाधान पारंपरिक शिल्प उद्योग से जुड़ी सहकारी समितियों और संस्थाओं का विकास भी हो सकता है। उर्मूल मरुस्थली बुनकर विकास समिति इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। इससे मेघवाल समुदाय के 120 दलित बुनकर परिवार जुड़े हैं। आज इन दलितों का न सिर्फ रहन-सहन बेहतर है, बल्कि यहां से अब पलायन भी रुक चुकी है। इतना ही नहीं, स्थानीय रोजगार के तमाम अवसर मानो पुनर्जीवित हो गए हैं।

दलितों को आर्थिक मदद की दरकार है। सच यही है कि कारोबारी क्षेत्र में दलितों की उपस्थिति बढ़ नहीं रही। साल 1990 में इस क्षेत्र में दलितों की उपस्थिति 9.9 फीसदी थी, जो साल 2005 में कम होते हुए 9.8 फीसदी हो गई। अनुसूचित जाति/ जनजाति उद्यमियों को प्रोत्साहित करने का एक तरीका यह है कि हम इस तबके के संघर्ष कर रहे उद्यमियों की आर्थिक मदद करें और लघु व मध्यम उद्योगों को मजबूत करके उनके जरिये दलितों की उद्यमिता को निखारें। इस लिहाज से स्टैंड अप इंडिया अभियान में छोटे व मध्यम आकार के उद्योगों पर खास तवज्जो देना दलितों के लिए फायदेमंद होगा। वैसे यहां तेलंगाना से सीखा जा सकता है। तेलंगाना ने जिला औद्योगिक केंद्रों के जरिये दलित महिला उद्यमियों पर खासा ध्यान देना शुरू किया है। कर्नाटक सरकार ने भी दलित दुग्घ उत्पादकों के लिए यह नीति बनाई है कि उन्हें महज 25,000 में एक जोड़ी गाय दी जाए, यानी 75,000 रुपये की सब्सिडी। यह एक अच्छी शुरुआत है।

कृषि-क्षेत्र में भी दलितों की सुविधाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए। भूमि का एक समान व पारदर्शी वितरण असामान्य सामाजिक ढांचे को दुरुस्त करता है। भूमि सुधार से मिला-जुला नतीजा निकला है। स्थिति यह है कि आज भी जहां ‘कागजों’ पर जमीन का वितरण है, वहां दलितों को उनका हक नहीं मिल सका है। ग्रामसभा स्तर पर सामाजिक ऑडिट के जरिये ही इसे ठीक किया जा सकता है। वैसे, इसमें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की निगरानी में गठित विशेषज्ञ कमेटी की भी दरकार होगी, जो इस काम पर निगाह रखे। हमें न सिर्फ भूमि सुधार की जरूरत को समझना होगा, बल्कि कृषि में दलितों को बराबर का न्याय भी देना होगा।

आंध्र प्रदेश की राज्य सरकार 1969 से एक योजना चला रही है, जिसके तहत सरकारी बंजर जमीन का बंटवारा भूमिहीनों में, खासतौर पर दलितों में किया जाता है। भूदान कार्यक्रम के तहत 1,13,972 एकड़ से अधिक जमीन 43,000 जरूरतमंदों को बांटे गए थे। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन-जिन दलितों को जमीन मिली है, उन्हें सामूहिक सिंचाई की सुविधा भी मिले। साथ ही, बेहतर बीज, भंडारण की सुविधा भी उन्हें मिलनी चाहिए। भूदान का अर्थ सिर्फ भूमि का दान नहीं होना चाहिए। आज हमारा समाज ऊंची-ऊंची उड़ानें भर रहा है। महज एक पीढ़ी के भीतर वह सामंतवाद से उत्तर-आधुनिकतावाद की ओर बढ़ता हुआ दिख रहा है। ऐसे में, यह नई और आधुनिक पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह समाज में समानता लाए। दलितों की आजीविका से जुड़े इन तमाम मुद्दों पर आवाज बुलंद करने की दरकार है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:dalits are still far from mainstream