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सुरों पर हावी हो रही है तकनीक
असीम चक्रवर्ती
First Published:26-05-12 01:36 PM
कभी आवारा फिल्म के एक गाने घर आया मेरा परदेसी.. के लिए संगीतकार शंकर-जयकिशन ने सौ वायलिनों का उपयोग किया था। यह गाना एक स्वप्न दृश्य के लिए तैयार किया गया था। आज इस तरह का क्रियेशन कम ही देखने को मिलता है। असल में तकनीक ने आज के संगीतकारों का काम बहुत आसान कर दिया है। लेकिन इसी के साथ ही वह मेलोडी की बात एकदम भूल गये हैं। उन्हें लगता है कि एक सिंथेसाइजर के सहारे ही वह अपनी कर्णप्रियता को बनाये रख सकते हैं।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि बॉर्डर, एलओसी, अशोका, उमराव जान जैसी कई फिल्मों में कर्णप्रिय सुर रचना करने वाले अनु मलिक इन दिनों इंडियन आइडल की तलाश कर रहे हैं। इधर जिन भी फिल्मों में वह संगीत दे रहे हैं, वह आज के शोरगुल वाले संगीत में कहीं दबता हुआ नजर आ रहा है। अभी दो साल पहले यमला पगला दीवाना का उनका सुपर हिट गाना टिंकू जिया़.. को आज कोई शायद ही सुनना चाहे, जबकि उनकी सुपर फ्लॉप फिल्म उमराव जान के गाने अगले जन्म मोहे बिटिया न कीजो.. को एक बार सुनने के बाद आप उसे बार-बार सुनना चाहेंगे। इस गाने के गीतकार जावेद अख्तर बताते हैं, ‘इसकी खासियत यह है कि ट्यून से ज्यादा शब्दों को खुलकर आने दिया गया है। मैं अनु की तारीफ करूंगा कि उसने इसमें ट्यून को एकदम हावी नहीं होने दिया है। सिचुएशन और गाने के बोल के मुताबिक सारी सुर रचना की गयी है। मेरा ख्याल है कि इस तरह के गाने पूरी म्यूजिकल टीम की मेहनत का नतीजा होते हैं।’ जावेद अख्तर की बातों का समर्थन करते हुए अनु कहते हैं, ‘मेरे कई हिट गानों को जावेद साहब ने लिखा है। वाकई सदाबहार गाने ऐसे नहीं बनते। मुझे अच्छी तरह से याद है, जब बॉर्डर के लिए मैंने और जावेद साहब ने मिलकर सुरीले गीत बनाये थे। मैं इसे कोई संयोग नहीं मानता हूं कि जावेद अख्तर और गुलजार के साथ के मेरे सारे गाने श्रोताओं को खूब पसंद आये। इन गानों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इनमें बोल और ट्यून एक दूसरे के पूरक होते हैं। कोई एक दूसरे पर हावी नहीं होता है।’
इशारों ही इशारों में अनु एक कटु सच की और इंगित कर देते हैं। सच तो यह है कि आज के ज्यादातर गानों में गीत और धुन का कोई तालमेल ही नहीं दिखता है। तेज रिद्म अच्छी शायरी को बिगाड़ने में कोई कमी नहीं बरतती है। इन दिनों तेजी से लाइम लाइट में आये गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य भी मानते हैं कि कई बार सिर्फ गाने को नृत्य प्रधान बनाने के लिए उसमें तेज संगीत डाला जाता है। वह बताते हैं, ‘मुझे लगता है कि कई बार इसकी कोई जरूरत नहीं होती है। अच्छी शायरी से भरपूर हल्की-फुल्की धुनवाले गाने भी आपको थिरकने के लिए बाध्य कर सकते हैं। आप मेरी पिछली फिल्म अग्निपथ के कुछ गाने सुन लीजिए, इन गानों के बोल ही सारी हकीकत बयां कर देते हैं। मैं किसी भी संगीतकार के सृजन में हस्तक्षेप करना एक गैर जरूरी बात मानता हूं। यदि सिचुएशन की मांग है तो ऐसे गानों को बेहद लाइट म्यूजिक के सहारे भी पेश किया जा सकता है।’ लेकिन सिचुएशन की बात इधर एकदम गौण हो गयी है। आज सिचुएशन के मुताबिक गाने कम ही सुनने को मिलते है। संजीदा गीतकार गुलजार का भी यही दर्द है। वह कहते हैं, ‘सिचुएशन का ख्याल रखा जाये तो हर गाना अपनी एक अलग जमीं बना सकता है। मगर इसके लिए हर गाने के मूड और सिचुएशन को समझना होगा। आप यदि हर गाने में गिटार, ढोल जैसे तेज वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल करने लगे तो यह एक तरह से इन अच्छे वाद्य यंत्रों के साथ अन्याय होगा।’
हमारे यहां तबला, सरोद, सितार, वायलिन, बांसुरी, जलतरंग, माउथ ऑर्गन आदि ढेरों अत्यंत कर्णप्रिय वाद्य यंत्रों की एक लंबी श्रृंखला मौजूद है, लेकिन इधर उनका सटीक उपयोग नहीं हो रहा है। कई फिल्मी गानों में अपने सरोद का जादू चला चुके प्रसिद्ध सरोद वादक रणजीत पाठक कहते हैं, ‘देखिए, हमारे सारे वाद्ययंत्र बेहद सुरीले हैं। स्वतंत्र रूप से इनको लाइव सुनिए तो सारे वाद्य आपको एक अलग तरह का सुकून देंगे। लेकिन किसी फिल्मी गाने में इनका उपयोग गाने के पूरे मूड पर निर्भर करता है। आप बेवजह किसी गाने में सिर्फ सरोद या वायलिन का उपयोग नहीं कर सकते।’
लेकिन अब सारे वाद्य भुला दिये जा रहे है। एक की-बोर्ड के सहारे ही सारे वाद्ययंत्रों का काम निकाला जा रहा है। जाहिर है, कर्णप्रियता अब बहुत हाशिए पर आ गयी है। कभी आवारा फिल्म के एक गाने घर आया मेरा परदेसी.. के लिए संगीतकार शंकर-जयकिशन ने सौ वायलिनों का उपयोग किया था। यह गाना एक स्वप्न दृश्य के लिए तैयार किया गया था। आज इस तरह का क्रियेशन कम ही देखने को मिलता है। संगीतकार उत्तम सिंह कहते हैं, ‘असल में तकनीक ने आज के संगीतकारों का काम बहुत आसान कर दिया है। लेकिन इसी के साथ ही वह मेलोडी की बात एकदम भूल गये हैं। उन्हें लगता है कि एक सिंथेसाइजर के सहारे ही वह अपनी कर्णप्रियता को बनाये रख सकते है।’
इसका नतीजा यह हुआ है कि उनके ट्यून में शोर-शराबा ज्यादा है, जबकि वह असानी से इससे बच सकते हैं। इसके लिए उन्हें सिर्फ तकनीक और मेलोडी का सही संतुलन बनाना पड़ेगा। और यह तभी संभव है, जब सारे वाद्ययंत्रों के बारे में आपकी जानकारी बहुत समुचित हो।’ प्रसिद्ध साउंड रिकॉर्डिस्ट सतीश गुप्ता कहते हैं, ‘मुश्किल यह है कि आज के ज्यादातर संगीतकार हर गाने का बीट्स बहुत तेज रखते हैं, जबकि हमारे कई ऐसे म्यूजिक इस्ट्रमेंट हैं, जो बहुत नाजुक हैं। पूरे रिद्म के साथ इनका आना बहुत जरूरी होता है। इन पर ज्यादा तकनीक हावी नहीं होनी चाहिए। अपने मूल स्वरूप में आकर ही ये वाद्ययंत्र अपना संपूर्ण प्रभाव छोड़ सकते है।’ जाहिर है संगीतकारों को यह समझाना सतीश गुप्ता का काम नही है। वैसे भी तकनीक के मारे हमारे संगीतकार फिलहाल यह बात समझने के लिए तैयार भी नहीं है।
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