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जैव विविधता और पारिस्थितिकी
First Published:29-07-12 08:17 PM
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जैव विविधता की सुरक्षा का लोकप्रिय तरीका है- पर्यावरणीय मूल्यों वाले क्षेत्रों की रक्षा करना। जैसे-जैसे वनों की कटाई बढ़ती गई, वैसे-वैसे यह सिद्धांत पुख्ता होता गया। ये संरक्षित इलाके दुर्लभ प्रजातियों के लिए अभयारण्य बन गए। इस तरह से हमारे सामने एक प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार होता है। 193 देश कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी के समझौते पर राजी हुए हैं। यह संधि 2020 तक रहेगी। हालांकि इसमें अमेरिका शामिल नहीं है, परंतु उम्मीद जताई जा रही है कि इसके तहत कम से कम 17 फीसदी पारिस्थितिकी समृद्ध क्षेत्रों की सुरक्षा मुमकिन हो पाएगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इन क्षेत्रों के चारों ओर कृत्रिम तंत्र की स्थापना जायज है? एक संरक्षण तंत्र के रूप में संरक्षित क्षेत्रों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है।

कई बार तो इसकी आलोचना की गई है, क्योंकि इसकी वजह से गरीब स्थानीय आबादी, जो वनों पर भोजन, लकड़ी व दूसरे संसाधनों के लिए आश्रित रहती है, उसे बेघर होना पड़ता है। दुनिया भर में हजारों संरक्षित क्षेत्रों का प्रबंधन बदलता रहा है। वैज्ञानिकों को अरसे से लगता रहा है कि खेती-किसानी व दूसरी गतिविधियों के अवैध अतिक्रमण से बचे हुए संरक्षित क्षेत्र जैव विविधता के लिहाज से मुफीद होते हैं। लेकिन इसके लिए यह दलील कि इन क्षेत्रों से लोगों को निकाल-बाहर करना जरूरी है, सही फैसला नहीं कहा जा सकता। हकीकत यह है कि ‘संरक्षित क्षेत्रों का लगभग आधा हिस्सा जैव विविधता की भयंकर कमी से जूझ रहा है।’ दरअसल, जैव विविधता व पारिस्थितिकी तंत्रों के आकलन से जो छिटपुट आंकड़े मिले हैं, उनके जरिये यह नतीजा सामने आया है। हालांकि इनके जरिये संसार भर में जैव विविधता की सेहत का सही-सही अंदाजा लगाना मुश्किल है। अधिकतर वैज्ञानिक मानते हैं कि जैव विविधता का मसला दुनिया भर में कभी राजनीतिक बहस का विषय न बन सका। अब तो जंतु व वनस्पति, दोनों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं। जानकारियों के मुताबिक, 5,490 स्तनधारी प्रजातियों में से हर पांचवीं प्रजाति लगभग विलुप्त होने के कगार पर हैं। जाहिर है, हमारी कोशिशों में चूक हो रही है।
नेचर, लंदन

 
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