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विद्रोह और बच्चे
द काठमांडू पोस्ट, नेपाल
First Published:15-06-12 10:55 PM
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माओवादी विद्रोह के दौरान नेपाल प्राय: अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बनता रहा। उनकी खबरों में महिलाओं और बच्चों के हाथों में तनी हुई बंदूकों वाली तस्वीरें छपती थीं। इन्हें शिविरों में प्रशिक्षण लेते हुए दिखाया जाता था। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट होती थी, ‘हिमालय की गोद में..।’

तस्वीरों व आलेखों के बीच बनी आकृतियों में सामान्यत: उन बच्चों के आस-पास बम और प्रेशर-कूकर रखे होते थे। माओवादी पार्टी द्वारा औरतों व खास तौर पर बच्चों के इस्तेमाल को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की एक खास मनोग्रंथि बन गई थी। फलस्वरूप, स्कूलों से बच्चों को उठाने और पीएलए के प्रशिक्षिण शिविरों में भर्ती करने की खबरें छपती रहीं। ऐसी खबरें नेपाल में भी प्रकाशित हुईं।

इसमें दोराय नहीं कि स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, सिविल सोसायटी व मीडिया एक-दूसरे से होड़ लेने की जंग में लगभग उन्मादित होकर बच्चों व महिलाओं की तस्वीरों को भुनाते रहे। जब देश में आंतरिक लड़ाई छिड़ी थी, तब माओवादियों व सुरक्षाकर्मियों द्वारा बाल हिंसा व बलात्कार की कई घटनाएं सामने आईं। 12-14 साल की लड़कियों के साथ बलात्कार व उनकी हत्या की घटनाओं ने न जाने कितने परिवारों को तबाह कर दिया। संयुक्त राष्ट्र ने इन घटनाओं को इंसानी हकों का ‘गंभीर उल्लंघन’ बताया था। बहरहाल, वक्त बदल चुका है।

नेपाल में सशस्त्र विद्रोह पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक रिपोर्ट पिछले महीने प्रकाशित हुई, जिसमें कहा गया है कि नेपाल में बाल उत्पीड़न की घटनाएं कम हुई हैं। यह एक अच्छी खबर है। नेपाल पर जो फीचर कुछ पैराग्राफ में है, उसका अहम पहलू यही है कि इस देश में अब वैसी माओवादी पार्टियां नहीं हैं, जो बच्चों का इस्तेमाल करती हैं। यानी वह दिन दूर नहीं, जब नेपाल एक विद्रोह मुक्त राष्ट्र होगा।

लेकिन बीते दशक में देश ने अपनी जो छवि बनाई, उससे देश से बाहर रह रहे कई लोगों को लगता है कि एक राष्ट्र के तौर पर नेपाल टूटने के कगार पर है। लेकिन ऐसी स्थिति अब नहीं है। हां, देश के राजनीतिक परिदृश्य में स्थायित्व नहीं है और अब भी कुछ सशस्त्र गुट सक्रिय हैं, जो आपराधिक संगठन लगते हैं। असली डर अब इन्हीं से है।

 
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