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पेंटागन के सैन्य चुनौती संबंधी चिंतन में से शीतयुद्ध अब पूरी तरह से गायब हो चुका है। इस हफ्ते जारी हुए चतुर्वाषिक डिफेंस रिव्यू से पता चलता है कि अमेरिका अपने सामने आज की दुनिया की तमाम लड़ाइयों को जरूर रखता है पर उसके मानस से शीतयुद्ध की चिंता उतर चुकी है। उसका मानना है कि अमेरिका दुनिया की प्रमुख सैन्य शक्ति है और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता कायम करने में वह अपने सहयोगियों पर ज्यादा निर्भर है। उसका यकीन है कि आज उसे शीतयुद्ध के खर्चीले हथियारों को तिलांजलि देनी होगी और अमेरिकी सुरक्षा बलों को दूसरे जरूरी कामों के लिए फिर से संयोजित करना होगा। अमेरिका के 2011 के रक्षा बजट के लिए जो मांग रखी गई है वह उसकी जरूरत के मुताबिक कम है। हालांकि जब अमेरिका इराक और अफगानिस्तान में लड़ाइयां लड़ रहा है तब ज्यादा कटौती संभव दिखती नहीं।
न्यूयार्क टाइम्स
अमेरिकी नजरिया
राष्ट्रपति बराक ओबामा की वैश्विक भागीदारी पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि अमेरिकी जनता उसे किस प्रकार अपनाती है और मुस्लिम समुदायों के प्रति कितना खुलापन दिखाती है। यह पहल उन्होंने साल भर पहले मुसलमानों के साथ नई राह पर चलने के संकल्प के साथ शुरू की थी। परिवर्तन इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी किस प्रकार सोचते हैं। इसलिए इस्लाम और मुसलमानों के बारे में उनके नजरिए की बड़ी अहमियत है। अमेरिकी इस्लाम और मुसलमानों के बारे में कितना जानते हैं? इसके अलावा यह भी देखना होगा कि किस नाते उनके मन में पूर्वाग्रह है और कैसै सहिष्णुता आ सकती है? गैलप सेंटर फार मुस्लिम स्टडीज के एक अध्ययन में इन विषयों पर रोशनी डाली गई है।
खलीज टाइम्स

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