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प्रतिभा पाटिल की विदाई
First Published:25-07-12 08:16 PM
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प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के साथ ही भारत की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल का कार्यकाल खत्म हो गया। अपने 60 वर्षो से कुछ ज्यादा वक्त में भारत का लोकतंत्र काफी समावेशी रहा है। यह कहना सही नहीं होगा कि भारत अब भी सबके लिए समान अवसरों का देश है, लेकिन दुनिया के हमसे पुराने लोकतंत्रों को देखते हुए हमने काफी बड़ी दूरी तय की है। जब भारत ने आजादी के बाद एक लोकतंत्र बनने का इरादा जाहिर किया था, तब इसे दुनिया भर में एक दुस्साहस माना गया था। एक विशाल अविकसित देश में जहां निरक्षरता का बोलबाला हो, वहां लोकतंत्र की विफलता के बारे में काफी भविष्यवाणियां की गईं। तब दुनिया के कई विकसित लोकतांत्रिक देशों में भी सार्वभौमिक मताधिकार नहीं था, लिंगभेद और नस्लभेद के आधार पर मताधिकार तय होता था। उस वक्त भारत ने अपने सभी वयस्क नागरिकों को मत देने का अधिकारी बनाया था। राष्ट्रपति का पद काफी हद तक शोभा का पद होता है, लेकिन फिर भी वह सर्वोच्च पद है और अब तक के 13 राष्ट्रपति भारत की विविधता को काफी व्यापक ढंग से दर्शाते हैं। ऐसा नहीं है कि प्रतिभा पाटिल राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाली पहली महिला थीं, लेकिन इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला होने का श्रेय उन्हें हासिल हुआ। प्रतिभा पाटिल के पहले एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति थे, जो अपनी अनौपचारिकता, सादगी और संवादप्रियता की वजह से बेहद लोकप्रिय हुए। उनके बाद आए प्रणब मुखर्जी समकालीन भारतीय राजनीति का एक वजनदार नाम हैं। इन दो प्रभावशाली शख्सियतों के मुकाबले प्रतिभा पाटिल अपेक्षाकृत कम चर्चित महिला रही हैं। राष्ट्रपति पद के लिए संप्रग की उम्मीदवार बनने से पहले वह राजस्थान की राज्यपाल थीं और उनका नाम राष्ट्रपति पद के दावेदारों में कहीं नहीं था, जैसे प्रणब मुखर्जी की दावेदारी की चर्चा महीनों पहले से चल रही थी। कांग्रेस और वाम दलों के बीच राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों की चर्चा के दौरान उनका नाम अचानक सहमति के उम्मीदवार की तरह उभरा। उन्हें लेकर राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया में कुछ विवाद खड़े करने की भी कोशिश विरोधियों ने की, लेकिन वह आसानी से चुनाव जीत गईं। इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि उनका कार्यकाल काफी सफल रहा। हालांकि वह उस तरह से अपनी छाप शायद नहीं छोड़ पाईं, जैसी कि केआर नारायणन ने छोड़ी थी, या वैसी लोकप्रियता नहीं अर्जित कर पाईं, जैसी कि डॉ. कलाम ने की थी। हमारे लोकतंत्र में वास्तविक सत्ता केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास होती है, जिसका मुखिया प्रधानमंत्री होता है। राष्ट्रपति को एक सांविधानिक प्रमुख के कर्तव्य निभाने होते हैं और इस दौरान यह ख्याल रखना होता है कि संविधान और लोकतांत्रिक परंपरा की बनाई सीमाओं के अंदर ही सारा कामकाज हो। पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद आजादी के आंदोलन के बड़े नेता थे और पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनके बीच राष्ट्रपति के अधिकारों और सीमाओं को लेकर काफी पत्रचार हुआ था। इस पत्रचार ने वे परंपराएं तय कर दीं, जो राष्ट्रपति के अधिकारों को परिभाषित करती हैं। प्रतिभा पाटिल ने इन परंपराओं के भीतर रहकर काम किया और इस तरह किसी अप्रिय विवाद या टकराव का कारण नहीं बनीं। बतौर राष्ट्रपति उन्होंने देश की बड़ी समस्याओं को अपने भाषणों में उठाया, चाहे वह भ्रष्टाचार का मुद्दा हो, सरकार की जवाबदेही का या महिलाओं के अधिकारों का। भविष्य में भी महिला राष्ट्रपति बनेंगी, पर पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभा पाटिल को हमेशा याद किया जाएगा।

 
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टिप्पणियॉ पढ़े(1)
यह कहना सही नहीं होगा कि भारत अब भी सबके लिए समान अवसरों का देश है, लेकिन दुनिया के हमसे पुराने लोकतंत्रों को देखते हुए हमने काफी बड़ी दूरी तय की है, किस हरामजादे की औलाद को भरोसा हे इस बात अगर ये सही हैं तोह मिनोरिटी और दलित को आर्रचन की बात लयों करते वैसे तुमने दलित के लिए क्या जी का मुंबई बैंक में कितना बकाया उसको कोंग्रेस ने कितने में खेर दोनों राष्ट्रपति/पत्नी ही कोंग्रेस नें खरीदे भी सालो देश की ये हालत हे की रिक्शे वाला अपने बचे को सही से पढ़े लिखा नहीं खेर किस बीके हुए जमीर ने लिखा हैं कितने दिए उस अम्मा ने ये लिखने
By manjil (26th-July-2012 01:48:AM)
 
 

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