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सूखे की आशंका
First Published:24-07-12 08:17 PM
जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा है, बारिश की कमी से होने वाली समस्याओं की फिक्र बढ़ती जा रही है। इस वक्त देश में मानसून की बारिश में 22 प्रतिशत की कमी बताई जा रही है। कुछ इलाके ऐसे हैं, जिनमें बेहद कम बारिश हुई है। सरकार यह मान रही है कि इस वर्ष औसतन सामान्य की 92 प्रतिशत बारिश होगी, हालांकि मई में लगाए गए 98 प्रतिशत के अनुमान से यह काफी कम है। सुनने में औसतन 92 प्रतिशत कोई भारी कमी का संकेत नहीं देता, लेकिन भारत जैसे विशाल देश में इसका अर्थ होता है कि कई इलाकों में औसत बारिश, कहीं औसत से ज्यादा बारिश और काफी सारे इलाके में औसत से काफी कम बारिश। इसी आशंका को देखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी तमाम मंत्रलयों को स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और पश्चिमी राजस्थान जैसे कुछ राज्य और क्षेत्र बारिश की कमी से बुरी तरह प्रभावित हैं और वहां सूखे की आशंका मंडरा रही है।
देर से ही सही, यदि ठीकठाक बारिश हुई, तो स्थिति कुछ संभल सकती है, लेकिन कुछ नुकसान तो तय है। सरकार इस बात की तैयारी कर रही है कि सूखे की स्थिति में किसानों को बीज, सिंचाई के लिए बिजली और पशुओं के चारे के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए जाएं। अच्छी बात यह है कि पिछले वर्ष की बंपर फसल की वजह से अनाज की किल्लत नहीं होगी, लेकिन हमारे यहां वितरण और भंडारण का जो हाल है, उसके मद्देनजर कुछ न कुछ दिक्कत होना लाजमी है। इसके अलावा पहले से बढ़ी महंगाई और ज्यादा बढ़ सकती है। पिछले वर्ष के शानदार मानसून और रिकॉर्ड फसल के बावजूद अगर अर्थव्यवस्था फिसलती जा रही है और महंगाई काबू में नहीं आ रही, तो सूखे की आशंका तले आम जनता व सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी। जहां सिंचाई का इंतजाम है, वहां भी खेतों में पानी देने के लिए बिजली और डीजल के पंपों का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ेगा। बिजली की आपूर्ति पूरे देश में ही अनिश्चित है, वहीं डीजल पंपों का इस्तेमाल किसानों की लागत बढ़ाएगा। कोयले की आपूर्ति की अनियमितता की वजह से ताप बिजलीघर अपनी क्षमता से काफी नीचे काम कर रहे हैं और बारिश की कमी की वजह से पनबिजली संयंत्र मुश्किल में हैं।
इस सबका मिला-जुला असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। मानसून पर अपनी निर्भरता घटाना हमारे लिए नामुमकिन है और मौसम की अनियमितता का कोई क्या कर सकता है, लेकिन कई समस्याएं हमारी अपनी बनाई हुई हैं। पानी का प्रबंधन लंबे अरसे से बदतर होता जा रहा है। देश में बुरे से बुरे दौर में भी बारिश 80-90 प्रतिशत से कम नहीं होती और अगर इस पानी का भी ठीक से संग्रहण और प्रबंधन किया जाए, तो संकट की स्थिति नहीं पैदा हो सकती। लेकिन जलप्रबंध के ज्यादातर स्थानीय इंतजाम बरबाद हो रहे हैं और कुछ बड़ी नदियों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इन नदियों में पानी रहे इसके लिए ठोस इंतजाम नहीं किए जा रहे हैं। जमीन में पानी का स्तर नीचे चला जा रहा है और इसे ऊंचा करने के लिए कोशिशें नहीं की जा रही हैं। बिजली का संकट भी मानसून की वजह से नहीं है, अलबत्ता इससे उसकी गंभीरता बढ़ सकती है। आखिरकार हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि हर साल मानसून आदर्श रहे, हर दो-तीन साल बाद मानसून गड़बड़ तो होता ही है। अब भी देश का बहुत बड़ा हिस्सा असिंचित है और पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है। पानी का सही प्रबंधन और सिंचाई का विस्तार ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें हमारी विफलता सूखे की आशंका को ज्यादा विकट बनाती है।
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