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प्रणब का प्रभाव
First Published:23-07-12 09:06 PM
जब प्रणब मुखर्जी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए औपचारिक रूप से प्रस्तावित किया गया, तभी उनका जीतना लगभग तय हो गया था। चुनाव नतीजे आने के बाद इस पर अब बाकायदा मोहर लग गई है। इस जीत में और जीत के भारी अंतर में कांग्रेस और संप्रग की तो बड़ी भूमिका तो है ही, लेकिन प्रणब मुखर्जी का व्यक्तिगत या उनके व्यक्तित्व का योगदान भी कम नहीं है। गठबंधनों और पार्टियों की सीमाओं के बाहर जैसा समर्थन उन्हें मिला, उससे उनकी स्वीकार्यता का अंदाजा होता है। जनता दल (यू) और शिवसेना जैसी पार्टियां जो राजग में ही एक-दूसरे के नाम से भागती हैं, वे प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने में एकमत हो गईं। प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना इस मायने में महत्वपूर्ण है कि उनका राजनीतिक कद बहुत बड़ा है और शायद ही किसी मौजूदा राजनेता के पास उनके जैसा संसदीय व प्रशासनिक अनुभव हो। इस कद और अनुभव का लाभ भारत की राजनीति को कई मायनों में होगा। सबसे बड़ी बात यह होगी कि प्रणब मुखर्जी ऐसे राष्ट्रपति होंगे, जिनकी बात सभी सम्मान से सुनेंगे और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में व सही राह पर राजनीतिक प्रक्रिया को ले जाने में मददगार हो सकते हैं। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीतिक करियर में लगातार संवाद स्थापित करने और विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तियों के बीच सामंजस्य बनाने का काम किया है। इसकी एक वजह यह रही है कि उनका संपर्क व्यापक रहा है, वह तमाम राजनीतिक दलों से बात कर सकते हैं, अपनी पार्टी के झगड़ों में शांति स्थापित करते रहे हैं और लगातार सरकार व राजनीतिक वर्ग के बीच संपर्क सूत्र बने रहे हैं। यह व्यापक जनसंपर्क और संवाद सर्वोच्च पद के कर्तव्य निभाने में उनके काम आएगा। कांग्रेस और संप्रग के लिए बिना प्रणब मुखर्जी के कामकाज चलाने में काफी कठिनाई होगी, क्योंकि अब पुरानी पीढ़ी के ऐसे राजनेता लगभग नहीं हैं, जिनके पास व्यापक अनुभव हो और जिनकी पैठ और विश्वसनीयता तमाम पार्टियों व गठबंधनों के परे हो। इसके साथ ही यह भी अच्छा है कि एक काबिल और अनुभवी राजनेता के करियर का सर्वोच्च शिखर भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पद हो।
राष्ट्रपति चुनाव और प्रणब मुखर्जी की नामजदगी ने कई राजनीतिक समीकरण बनाए-बिगाड़े। राजग को यह उम्मीद थी कि राष्ट्रपति चुनाव में संप्रग के अंदर झगड़े उग्र रूप ले सकते हैं। ममता बनर्जी के तेवर से ऐसा लगा भी, लेकिन संप्रग के राजनीतिक रणनीतिकारों की समझदारी और प्रणब मुखर्जी के अपने प्रभाव की वजह से न सिर्फ संप्रग की स्थिति मजबूत हुई है, बल्कि राजग की कमजोरियां सामने आई हैं। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों से ही यह समझना गलत होगा कि संप्रग की मुश्किलें खत्म हो गई हैं। ममता बनर्जी किसी भी वक्त विस्फोटक रुख अख्तियार कर सकती हैं और फिलहाल शरद पवार की पार्टी विद्रोही रवैया अपनाए हुए है। इसका अर्थ साफ है कि प्रणब मुखर्जी के सक्रिय राजनीति से हट जाने के बाद भी उनके किस्म की राजनीति यानी संवाद और समन्वय को साधने की जरूरत कम नहीं हुई है। भारत की अर्थव्यवस्था जिस तरह की समस्याओं में घिरी है, उन्हें हल करने के लिए आर्थिक व प्रशासनिक स्तर पर कई बड़े फैसलों की जरूरत है और ये फैसले राजनीतिक प्रबंधन के बिना नहीं किए जा सकते। यह मानी हुई बात है कि कई उलझनों को सुलझाते वक्त संप्रग के मौजूदा नेतृत्व को प्रणब मुखर्जी की शैली की याद आएगी। यह अहसास फिर भी अच्छा है कि राष्ट्रपति भवन में प्रणब मुखर्जी अपने अनुभव और समझ के साथ राजनेताओं को परिपक्व सलाह देने के लिए मौजूद होंगे।
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