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तेज दौड़ का गणित
First Published:15-07-12 08:44 PM
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लंदन ओलंपिक अब आ ही गए हैं और जिन लोगों पर सबसे ज्यादा नजरें हैं, उनमें उसैन बोल्ट हैं। क्या उसैन बोल्ट अपना रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे? अगर बोल्ट के साथ सब कुछ सही रहा, तो यह मानी हुई बात है कि उनका मुकाबला सिर्फ खुद से है। इस सवाल को पहले काफी दूर की कौड़ी माना जाता था, लेकिन बोल्ट के आने से बाद इस सवाल में एक तात्कालिकता आ गई है- क्या इंसान नौ सेकंड में 100 मीटर दौड़ पाएगा? 2008 में बीजिंग ओलंपिक में बोल्ट ने 9.69 सेकंड में 100 मीटर की दौड़ जीतकर विश्व रिकॉर्ड बनाया था।

अगले साल बर्लिन विश्व चैंपियनशिप में बोल्ट ने 9.58 सेकंड का नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। 2008 के पहले एक गणितज्ञ रजा नौबरी ने हिसाब लगाया था कि 9.44 सेकंड इंसान की क्षमता की आखरी हद है। बीजिंग ओलंपिक के बाद उनका कहना था कि इस भविष्यवाणी में सुधार की गुंजाइश है। लेकिन यह सवाल सचमुच हल नहीं हुआ है कि इंसान की सीमा क्या है? फर्राटा दौड़ के बारे में कुछ कहना उतना आसान नहीं है, जितना दूसरे खेलों के बारे में, क्योंकि तेज दौड़ने के बारे में वैज्ञानिक जानकारी बहुत कम है। एक समस्या यह है कि फर्राटा दौड़ इतनी तेजी से खत्म हो जाती है कि इसमें जो कारक शामिल हैं, उनका विश्लेषण करना मुश्किल होता है, और यह बताना भी कि किस सुधार के साथ कितनी गति बढ़ जाएगी। ज्यादातर खेलों में वैज्ञानिक बता सकते हैं कि तकनीक, फिटनेस में या खेल सामग्री में क्या बदलाव किए जाएं, तो प्रदर्शन कितना सुधर सकता है, तेज दौड़ में ऐसी भविष्यवाणी फिलहाल नामुमकिन है।

मसलन, यह मालूम है कि फर्राटा दौड़ एक एनोरेबिक स्पोर्ट्स है, इसलिए इसके लगभग सभी खिलाड़ी अपेक्षाकृत कम लंबे और मजबूत कद-काठी के होते हैं, लेकिन बोल्ट ऐसे नहीं हैं। उनकी कद-काठी किसी लंबी दूरी के दौड़ाक जैसी है, वह लंबे और छरहरे हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि 100 मीटर की दौड़ को प्रभावित करने वाले कारक प्रकृति प्रदत्त और स्वाभाविक होते हैं, उनकी व्याख्या मुश्किल है। वैज्ञानिकों ने तेज दौड़ की प्रक्रिया को दो हिस्सों में विश्लेषित किया है। पहला हिस्सा, जब पैर हवा में हो, और दूसरा, जब पैर जमीन पर हो। उन्होंने पाया कि हर धावक अपना पैर उठाकर फिर जमीन पर रखने की प्रक्रिया में 1/3 सेकंड लेता है। वे मानते हैं कि यह संभवत: इंसान की जैविक सीमा है, चाहे वह आम आदमी हो या बोल्ट, दौड़ते वक्त इतना ही समय लगाता है। इसलिए गति इस बात पर निर्भर करती है कि दौड़ाक जमीन पर कितना बल लगा सकता है। चीते या हिरन अपने शरीर की बनावट और अपनी रीढ़ की हड्डी के स्प्रिंग जैसे इस्तेमाल से यह बल बढ़ा लेते हैं, मगर इंसान को सिर्फ अपने दो पांवों से यह बल अजिर्त करना है। तेज दौड़ाक हर कदम में अपने वजन से लगभग ढाई गुना बल जमीन पर लगाते हैं, यानी बोल्ट या कार्ल लुईस का हर कदम लगभग 400 किलोग्राम के बल के साथ जमीन पर आता है। सोचकर देखिए, सिर्फ एक पैर पर खड़ा होकर इतना वजन अगर कोई वेट लिफ्टर उठाए, तो क्या होगा? 100 मीटर के दौड़ाक को सेकंड के एक छोटे-से हिस्से के लिए यह बल लगभग 90 कदमों तक लगाना होता है। यह बल गति बढ़ाने वाला होता है और इससे तय होता है कि कौन चैंपियन बनेगा। पर इससे यह बताना मुश्किल है कि नौ सेकंड की समय-सीमा कब टूटेगी। टूटेगी भी या नहीं। 1891 में 10.8 सेकंड का विश्व रिकार्ड था और 10 सेकंड की सीमा पार करते-करते लगभग 80 साल लग गए थे। लेकिन 100 मीटर की दौड़ प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा पर निर्भर होती है, और इसकी तो कोई सीमा नहीं है।

 
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