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नई राहों के अन्वेषी
First Published:08-07-12 08:57 PM
‘हिग्स बोसोन’ की प्रायोगिक खोज के बाद सत्येन्द्रनाथ बोस का नाम चर्चा में है। विज्ञान में बोस का नाम पहले से ही सम्मान से लिया जाता है। उन्हें कभी नोबेल पुरस्कार नहीं मिला, जबकि उनके ही काम पर आधारित खोजों को कई नोबेल पुरस्कार मिल गए। सत्येन्द्रनाथ बोस को ‘बोस आइन्स्टाइन स्टैटिस्टिक्स’ और ‘बोस-आइन्स्टाइन कंडसेट’ के लिए जाना जाता है और एक किस्म के सूक्ष्म कणों को उनके सम्मान में ‘बोसोन’ नाम दिया गया। सत्येन्द्रनाथ बोस के ज्ञान का दायरा बहुत विस्तृत था। भौतिकी, गणित, रसायनशास्त्र, जीव विज्ञान के अतिरिक्त उन्हें दर्शन, साहित्य और कलाओं में दिलचस्पी थी। वह बांग्ला, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन और संस्कृत भाषाएं जानते थे और ‘इसराज’ नामक वाद्य बजाते थे। यह कहानी दिलचस्प है कि बोस ने ‘बोस आइन्स्टाइन स्टैटिस्टिक्स’ की खोज कैसे की थी? बोस ढाका विश्वविद्यालय में छात्रों को भौतिकी पढ़ा रहे थे। वह ‘विकिरण’ और ‘अल्ट्रावायलेट कैटेस्ट्रॉफी’ पढ़ा रहे थे और छात्रों को यह बताना चाहते थे कि तत्कालीन सैद्धांतिक ज्ञान इन चीजों को समझने के लिए अपर्याप्त है, क्योंकि उसके नतीजे प्रायोगिक नतीजों के साथ मेल नहीं खाते। यह वह दौर था, जब सापेक्षता व क्वांटम भौतिकी ने जड़ें जमानी शुरू कर दी थीं। दरअसल विकिरण और अल्ट्रावायलेट कैटेस्ट्रॉफी जैसी परिघटनाएं जिस स्तर पर घटित होती हैं, वे क्लासिकल भौतिकी के नियमों से परे होती हैं। पढ़ाते हुए बोस एक गलती कर गए। यह गलती कुछ इस तरह की थी कि मान लीजिए दो सिक्के एक साथ उछाले जाते हैं, तो दोनों ही के एक साथ ‘चित’ आने की संभावना कितनी है? आम सांख्यिकी के हिसाब से इसका जवाब होगा 25 प्रतिशत। बोस ने गलत उत्तर मान लिया, ‘एक तिहाई’ यानी एक तिहाई दोनों ‘चित’, एक तिहाई दोनों ‘पट’ और एक तिहाई ‘एक चित और एक पट।’ लेकिन जब उन्होंने इस आधार पर गणना की, तो जवाब प्रायोगिक नतीजों के मुताबिक आया। तब बोस को लगा कि ऊर्जा के विकिरण में सूक्ष्म कणों के लिए नियम अलग होते हैं। दरअसल क्वांटम भौतिकी के नियमों के मुताबिक यही जवाब सही था। उन्होंने इस पर एक परचा लिखा, लेकिन ढाका विश्वविद्यालय के 30 वर्षीय भारतीय रीडर के परचे को कौन गंभीरता से लेता? आखिर उन्होंने सीधे आइन्स्टाइन को वह परचा भेजा। आइन्स्टाइन इसका महत्व समझ गए और उन्होंने उसे जर्मन में अनुवाद करके छपवाया। दोनों वैज्ञानिकों ने इस काम को आगे बढ़ाकर ‘बोस- आइन्स्टाइन कंडसेट’ की खोज की।
विज्ञान में कई खोजें इसी तरह से हुई हैं। चुंबक से बिजली बनाने का जो तरीका हम आज इस्तेमाल करते हैं, उसकी खोज माइकल फैराडे ने की। वह आठ वर्षों तक बिजली बनाने की नाकाम कोशिश करते रहे और आखिरकार गुस्से में उन्होंने चुंबक को फेंक दिया। तभी वोल्टमीटर की सुई हिली और फैराडे समझ गए कि विद्युतीय कुंडली के पास चुंबक की गति से बिजली पैदा होती है। इसी तरह अलेक्जेंडर फ्लेमिंग को पेनिसिलिन यूं मिली कि प्रयोगशाला की खिड़की खुली होने से उनकी पेट्री डिश में फफूंद जम कई और उससे पेनिसिलिन की खोज हुई। कहा यह जाता है कि अगर फ्लेमिंग की प्रयोगशाला एयरटाइट होती, तो पेनिसिलिन की खोज न होती। प्रख्यात दार्शनिक कार्ल पॉपर का तर्क है कि विज्ञान का विश्लेषणात्मक तर्क वैज्ञानिक खोजों के लिए काफी नहीं है, वह कला की तरह ही रचनात्मक काम है। मुद्दा यह है कि विज्ञान में भी साधनों से ज्यादा रचनात्मकता और समर्पण की जरूरत होती है, कभी-कभी तो साधनों का अभाव ही फायदेमंद साबित होता है। राह भटकने वाले ही अक्सर नई राहों के अन्वेषी होते हैं।
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