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मानसून में देरी
First Published:03-07-12 09:19 PM
केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार मानसून में देरी की वजह से खेती पर असर को बहुत गंभीर नहीं मानते। पवार का कहना है कि मानसून इस बार लगभग दो हफ्ते की देरी से आया है, लेकिन अगले कुछ हफ्तों में अच्छी बारिश हो गई, तो फसल पर ज्यादा बुरा असर नहीं पड़ेगा। मानसून में कमी-बेशी का असर उन इलाकों पर ज्यादा पड़ता है, जहां फसलें जल्दी बोई जाती हैं और सिंचाई कम है। ऐसे क्षेत्रों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के कुछ इलाके हैं। इन दिनों धान की दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्यों में पंजाब और हरियाणा शामिल हैं, जहां मानसून में देरी का असर कम होगा, क्योंकि वहां बुवाई देर से होती है और सिंचाई की सुविधाएं भी बेहतर हैं। फिर भी देश के 40 प्रतिशत कृषि क्षेत्र के बारे में कहा जा सकता है कि वहां सिंचाई की सुविधाएं हैं और एकाध मानसून में गड़बड़ी वह बर्दाश्त कर सकता है। बचा हुआ 60 प्रतिशत इलाका मानसून पर निर्भर होता है और यहां अगर मानसून और भी देर से पहुंचा, तो मुश्किल हो सकती है। कुल जमा मानसून प्रकृति का ऐसा तंत्र है और भारत इतना विशाल देश है कि बुरे से बुरे वर्ष में भी ज्यादातर भू-भाग में ठीक-ठाक बारिश हो जाती है और मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल मानसून पिछले साल जितना अच्छा तो नहीं होगा, लेकिन बहुत बुरा भी नहीं होगा। मौसम वैज्ञानिक मान रहे हैं कि अगले दो हफ्तों में देश के सभी हिस्सों में बारिश पहुंच जाएगी और अगर अगले दो महीने अच्छी बारिश हुई, तो फसलों को नुकसान ज्यादा नहीं होगा। पिछले साल का मानसून असाधारण रूप से अच्छा था और उसके कारण फसल ने भी पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए। 2011-12 में देश में 25.56 करोड़ टन फसल हुई। जाहिर है, इस साल देश के गोदाम भरे हुए हैं और अगर एकाध मौसम में पैदावार उतनी अच्छी नहीं होती है, तब भी अनाज की कमी नहीं होगी।
समस्या यह है कि अगर ज्यादा अनाज हो तब भी और कम अनाज हो तब भी किसानों की समस्याएं बनी रहती हैं और उपभोक्ताओं की भी। खेती से उपभोक्ता तक का जो तंत्र है, वह इतने पेचों, राजनीतिक और आर्थिक निहित स्वार्थो और सरकारी गड़बड़ियों से भरा है कि न ज्यादा फसल का भरपूर लाभ मिलता है, न कम फसल के दौर में सुरक्षा। दूसरी बड़ी दिक्कत यह है कि मानसून पर निर्भरता हम कम नहीं कर पाए हैं। यह सही है कि मानसून पर निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं की जा सकती, लेकिन सिंचाई सुविधाएं बढ़ाकर काफी हद तक इसे कम किया जा सकता है। देश में पहली हरित क्रांति उत्तर और पश्चिम के कुछ इलाकों को छूकर रुक गई और अब लगभग 40-50 साल बाद भी देश के बड़े हिस्से को खेती में कुछ ठोस पहल का इंतजार है। देश का पूर्वी हिस्सा उपजाऊ है और अगर वहां सिंचाई और खेती से संबंधित सुविधाएं बढ़ाई जाएं, तो किसानों को भी फायदा होगा और इतनी फसल हो सकेगी कि मांग और पूर्ति का गणित कभी नहीं गड़बड़ाएगा। जरूरी नहीं कि वहां सिंचाई के लिए बड़ी योजनाएं बनाई जाएं, बल्कि परंपरागत तरीकों को ही बेहतर बनाया जा सकता है। इस वक्त जब भारत का बड़ा हिस्सा बारिश की कमी से जूझ रहा है, तो उसी समय असम में भारी बाढ़ आई हुई है। कहीं बाढ़ और कहीं सूखा, कुछ हद तक मानसून और उससे कहीं ज्यादा हमारे देश के सिंचाई तंत्र का स्वाभाविक चरित्र है। अच्छे से अच्छे मानसून में भी देश का एकाध इलाका सूखा रह जाता है, जबकि बुरे से बुरे दौर में भी कहीं न कहीं बाढ़ जरूर आती है। इनके साथ रहना हमने सीख लिया है, लेकिन इस सामंजस्य को बेहतर बनाने की कोशिश तो करनी ही होगी।
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