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फेसबुक का भविष्य
First Published:10-06-12 08:25 PM
इन दिनों इंटरनेट पर एक चर्चा जोरों पर है, चर्चा के केंद्र में एक शेयर बाजार एक्सपर्ट का यह बयान है कि ‘फेसबुक’ अगले पांच से आठ साल में गायब हो जाएगा। पिछले दिनों फेसबुक का आईपीओ आया था, जिसे ‘आईपीओ ऑफ द सेंचुरी’ कहा जा रहा था। लेकिन आईपीओ के बाद फेसबुक का शेयर औंधे मुंह गिरा। हो सकता है कि निवेश का जो मौजूदा माहौल है, उसमें किसी भी कंपनी का यही हश्र होता या फिर आर्थिक जानकारों के विवेक ने यह फैसला सुनाया हो कि फेसबुक आज तो जमकर चल रहा है, लेकिन उसका दूरगामी भविष्य नहीं है।
एक निवेशक संस्थान के जिस फंड मैनेजर ने 2020 तक फेसबुक के न रहने की भविष्यवाणी की है, उसका कहना है कि एक जमाने में ‘याहू’ का बोलबाला था, अब ‘याहू’ अपने शानदार दौर का 10 प्रतिशत रह गया है। यह ‘फेसबुक’ का दौर है, लेकिन अगला दौर मोबाइल एप्लीकेशन का होगा और फेसबुक की भी वही हालत होगी, जो ‘याहू’ की हुई है। यह मुमकिन है कि अगली कोई टेक्नोलॉजी या आइडिया आए और फेसबुक गायब हो जाए। लेकिन यह होने के लिए पांच या आठ बरस लगें यह जरूरी नहीं। हो सकता है कि किसी नए मार्क जुकेरबर्ग के दिमाग में कोई नया आइडिया आए और साल भर में वह आइडिया छा जाए। यह भी मुमकिन है कि ऐसा कोई नया आइडिया न आए और फेसबुक ही नई जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालता जाए।
ऐसे में फेसबुक की उम्र कितनी भी हो सकती है। आखिरकार फेसबुक नई चीज है, लेकिन सोशल नेटवर्किंग तो हजारों साल पुरानी है। जब कंप्यूटर नहीं थे, तब भी लोग सोशल नेटवर्किंग करते ही थे। गांव के चौपाल, शहर के चौराहों पर चाय और पान की दुकानें सोशल नेटवर्किंग केंद्र ही तो थीं। वैज्ञानिकों ने यूरोप में प्रागैतिहासिक काल के शैलचित्रों से यह निष्कर्ष निकाला कि उनमें से एक आदिम मनुष्य की सोशल नेटवर्किंग साइट थी, जहां अलग-अलग लोग आकर चित्रों की भाषा में अपने विचार या भावनाएं व्यक्त करते थे। फिर कोई अन्य व्यक्ति आकर चित्र बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करता था। सोशल नेटवर्किंग तो रहेगी, क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका रूप कैसा रहेगा, यह बताना मुश्किल है।
लेकिन इस मामले में एक निवेश संस्थान के फंड मैनेजर की भविष्यवाणी कितनी सही हो सकती है? यह दुरुस्त है कि मौजूदा हालात को देखते हुए भविष्य का अंदाज लगाना ऐसे मैनेजरों का काम है, ताकि वे सफल व सुरक्षित निवेश कर सकें, लेकिन यह भी सच है कि भविष्य का अंदाज लगाने में वे भी उतने ही सफल होते हैं, जितने दूसरे आम लोग। अगर ऐसा न होता, तो बाजार में मंदी के बड़े-बड़े दौर नहीं आते या आते, तो जानकारों को पहले से अंदाज लग जाता। वर्ष 2008 में आई विराट मंदी का असर तो विश्व अर्थव्यवस्था आज तक भुगत रही है। यह मंदी तो अमेरिका में निवेशक बैंकों की वजह से आई थी, जिससे ये बैंक दिवालिया हो गए थे।
दरअसल मानव समाज इतने जटिल और विविध धागों से बुना होता है कि उसके भविष्य के बारे में कुछ भी कहना काफी मुश्किल होता है। आज से दस साल पहले देश में एक टेलीफोन कनेक्शन पाना टेढ़ी खीर थी, आज हर हाथ में मोबाइल नजर आता है। क्या यह कल्पना किसी ने की थी? लेकिन कुछ पेशों का यह जरूरी कायदा है कि आप जो बोलें, आत्मविश्वास से बोलें। प्रबंधन, खास तौर पर आर्थिक प्रबंधन ऐसा ही पेशा है, वरना कौन आपको अपना पैसा निवेश के लिए देगा? भविष्य की अनिश्चितता से जीवन में रोमांच और दिलचस्पी बनी रहती है, लेकिन अटकल लगाना भी कोई कम दिलचस्प नहीं है।
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