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अक्ल की दुश्मन चीनी
First Published:20-05-12 10:52 PM
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आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का हलवाइयों से कुछ बैर है। वैज्ञानिक कहते हैं कि तले हुए खाद्य पदार्थ दिल के लिए बुरे हैं, यानी समोसे, कचौड़ी, भुजिया, छोले-भटूरे वगैरह पर पाबंदी। दूसरी पाबंदी चीनी पर है, क्योंकि चीनी कई समस्याओं की जड़ बताई जाती है। डायबिटीज तो एक जानी-पहचानी बीमारी है, इसके अलावा भी कई खामियां गिनाई जाती हैं- दांत खराब होने से लेकर त्वचा पर झुर्रियां आने तक। अब वैज्ञानिक चीनी के खिलाफ सबसे ज्यादा विस्फोटक आरोप लेकर आए हैं। अमेरिका की प्रतिष्ठित कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि ज्यादा चीनी का सेवन आपकी अक्ल को कुंद कर सकता है, यानी मिष्ठानप्रेमी लोगों के बुद्धू बन जाने का खतरा होता है। यह शोध इंसानों पर नहीं किया गया है, चूहों पर किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों और चूहों के दिमाग की बुनियादी बनावट और कार्यप्रणाली एक ही होती है, इसलिए इसके इंसानों में भी खरे उतरने की पूरी संभावना है। वैज्ञानिकों ने यह भी बताया कि चीनी के दुष्परिणामों से बचाने में ओमेगा-3 फैटी एसिड कारगर होते हैं, जो सबसे ज्यादा मछलियों में पाए जाते हैं, निरामिश चीजों में अलसी का तेल इनका ठीक-ठाक स्त्रोत है। वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में कुछ चूहों को एक भूल-भुलैया से बाहर आने का प्रशिक्षण किया। उसके बाद रोज चूहों को भोजन में भरपूर कॉर्न सिरप दिया गया। कॉर्न सिरप में चीनी से छह गुना ज्यादा मिठास होती है और यह बाजार में बिकने वाले शीतल पेयों या बिस्कुट, केक आदि में मिलाया जाता है। आधे चूहों को कॉर्न सिरप के अलावा ओमेगा-3 फैटी एसिड भी दिए गए। छह हफ्तों बाद फिर से चूहों को उस भूल-भुलैया में छोड़ा गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन चूहों को सिर्फ कॉर्न सिरप दिया गया था, उन्हें भूल-भुलैया से बाहर आने में ज्यादा वक्त लगा, यानी सीखने और याद रखने की उनकी क्षमता कम हो गई थी। वैज्ञानिक यह सोचते हैं कि खून में ज्यादा चीनी होने से शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध विकसित हो जाता है, जिससे दिमाग में चीनी की मात्रा का नियंत्रण करने वाली प्रणाली गड़बड़ा जाती है। इससे दिमाग की कोशिकाओं के तंतुओं के जोड़ खराब हो जाते हैं।

अगर चीनी इतनी खतरनाक है, तो क्यों मिठास सबसे पहले स्वाभाविक तौर पर अच्छा लगने वाला स्वाद है और क्यों खुशी का रिश्ता मिठास से जोड़ा जाता है? शायद इसकी वजह यह है कि शरीर में ग्लूकोज से सीधे ऊर्जा बनती है, बाकी खाद्य पदार्थों को ऊर्जा में बदलने के लिए काफी लंबी रासायनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। आदिम काल के जिस दौर में इंसान काफी कठिनाई से भोजन जुटाता था, तब कोई मीठी वस्तु उसके लिए नियामत थी, क्योंकि उसे खाते ही ऊर्जा मिल जाती है। आधुनिक काल से पहले चीनी यूं भी आसानी से मिलने वाली चीज नहीं थी। यूरोप के आम नागरिकों के लिए तो चीनी सुलभ तब हुई, जब अमेरिका की खोज हुई, जहां गन्ने की खेती हो सकती थी, उसके पहले तो चीनी सिर्फ राजा-महाराजाओं और अमीरों को ही मिल पाती थी। फिर पहले रोजमर्रा जीवन में सामान्यत: काफी मेहनत हो जाती थी, इसलिए चीनी के बुरे नतीजे नहीं होते थे। अब शारीरिक मेहनत कम हो गई और चीनी बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो गई, इसलिए चीनी को इतना खतरनाक माना जा रहा है, कुछ डॉक्टरों का कहना है कि चीनी पर नियंत्रण के लिए धूम्रपान या शराब पीने पर नियंत्रण की तरह ही मुहिम चलाई जानी चाहिए। वैज्ञानिकों ने जो विकल्प दिए हैं, वे डराने के लिए काफी हैं- या तो अपनी अक्ल की धार को बनाए रखो या फिर बुद्धू बनकर ढेर सारी मिठाई खाओ, फैसला आपका है।

 

 
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