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नाकामी का स्वीकार
First Published:30-12-10 11:36 PM
Last Updated:30-12-10 11:37 PM
नोएडा के चर्चित आरुषि हत्याकांड का ऐसा ही दुखद अंत होगा, यह काफी पहले से लग रहा था। आखिरकार सीबीआई ने अपनी विफलता कबूल करते हुए यह मामला अब बंद कर दिया। अब शायद यह कभी न पता चल पाए कि आरुषि तलवार और हेमराज बंजाडे की हत्या किसने की, लेकिन यह मामला सिर्फ एक हत्याकांड की गुत्थी सुलझ न पाने का नहीं है, इससे यह भी पता चलता है कि जिन सुरक्षा एजेंसियों, खासकर पुलिस पर अपराध रोकने या अपराधों की तहकीकात करने की जिम्मेदारी है, उनकी काबिलियत कितनी संदिग्ध है।
यह बार-बार कहा जाता रहा है कि पुलिस की पेशेवर काबिलियत बढ़ाई जानी चाहिए। अपराधों की तहकीकात का कौशल विशेषज्ञता की मांग करता है और जैसे-जैसे इस क्षेत्र में टेक्नोलॉजी उन्नत हुई है, विशेषज्ञता की जरूरत बढ़ती गई है, लेकिन नोएडा पुलिस ने शुरू में ही जांच में गड़बड़ियां कीं, उससे पता लगता है कि पुलिसकर्मियों को जांच के तौर-तरीकों की प्रारंभिक जानकारी भी नहीं थी।
नोएडा पुलिस की पहले दिन की गड़बड़ियों की वजह से ही जांच का काम हमेशा के लिए गड़बड़ हो गया। नोएडा पुलिस ने हत्या के स्थान को सुरक्षित नहीं रखा, वहां तमाम लोग आते-जाते रहे, जिससे कई जरूरी साक्ष्य मिलने की संभावना भी खत्म हो गई। घटनास्थल पर मौजूद शराब की बोतल को पुलिसवालों ने अपने हाथों से उठा लिया, जिससे उंगलियों के निशान मिलने की संभावना खत्म हो गई।
पुलिसवालों ने जगह का ठीक से मुआयना भी नहीं किया, इसलिए छत पर पड़ी हेमराज की लाश तक वह तभी पहुंची, जब एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने छत का यों ही मुआयना करने का सुझाव दिया। इसके अलावा फोरेंसिक जांच के लिए भेजे गए नमूने बदल दिए गए। पुलिस ने बिना ठोस सुबूत के आरुषि के पिता को गिरफ्तार करके उन्हें हत्यारा भी घोषित कर दिया था।
पुलिस ने तो अपनी नाकाबिलियत दिखाई ही, हत्या के पीछे की ताकतें भी इतनी शातिर और ताकतवर थीं कि उन्होंने साक्ष्यों को नष्ट कर दिया। पर अब न कभी इस हत्या का राज खुल सकेगा, न हत्यारों को सजा मिल सकेगी, और न ही संदेह के घेरे में जो बेगुनाह हैं, वे पूरी तरह संदेहों से मुक्त हो सकेंगे।
आरुषि हत्याकांड ने समाज को इसलिए झकझोरा था कि यह एक आम मध्यमवर्गीय परिवार में इकलौती बेटी की हत्या थी। जिस इलाके में यह हत्या हुई वह भी एक आम मध्यमवर्गीय इलाका है। यह अधूरी छूट गई जांच जहां एक ओर हमारी संवेदनशीलता और नैतिकता को झकझोरती है, दूसरी ओर उन सुरक्षा बलों की नाकामियों की ओर भी संकेत करती है जिन पर समाज की सुरक्षा का जिम्मा है।
सीबीआई को इस संदेह का लाभ दिया जा सकता है कि उसे यह मामला तब सौंपा गया जब बहुत देर हो चुकी थी और ज्यादातर साक्ष्य नष्ट हो गए थे। लेकिन आम तौर पर हत्या जैसे मामलों की जांच तो पुलिस का काम है और पुलिस धीरे-धीरे राजनैतिक हस्तक्षेप और उपेक्षा की वजह से अपनी पेशेवर कुशलता खो बैठी है। शायद अब कानून व्यवस्था और अपराधों की तहकीकात के लिए पुलिस में अलग-अलग विशेषज्ञता विकसित करने का वक्त आ गया है, वरना इसी तरह कानून से अपराधी बचते रहेंगे और हम अनसुलझे अपराधों को वक्त के धुंधलके में खोते देखते रहेंगे।
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