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हावड़ा ब्रिज पर गुटखा
First Published:30-05-10 08:06 PM
Last Updated:30-05-10 08:11 PM
कोलकाता का हावड़ा ब्रिज वैसे ही शहर की पहचान है जैसे दिल्ली का इंडिया गेट या मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया। इस्पात से बने इस पुल का निर्माण 1937 में शुरू हुआ और 1943 में यह परिवहन के लिए खोल दिया गया। पुराने लोगों को याद होगा कि 1958 में एक फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ बनी थी जिसमें मधुबाला और अशोक कुमार थे और वह जबरदस्त हिट हुई थी, लेकिन इंडिया गेट या गेटवे ऑफ इंडिया की तरह हावड़ा ब्रिज का सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व नहीं है, वह कोलकाता और हावड़ा को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण और उपयोगी इस्पात की कड़ी है और हुगली नदी पर तीन और बड़े पुलों के बनने के बाद भी उसका महत्व कम नहीं हुआ है। लेकिन इस पुल को एक बहुत आम-सी दिखने वाली चीज से खतरा है। पुल की देखरेख करने वाले लोग कहते हैं कि आते-जाते लोग पुल के खंभों पर गुटखा खाकर थूकते हैं। गुटखे में कुछ अम्लीय रसायन होते हैं जिनसे इन खंभों का लोहा गल जाता है। यह गलना गुटखे से ही हुआ है इसका प्रमाण यह है कि पैदल चलने वाले रास्ते पर जो खंभे हैं, उनका लोहा ज्यादा गला है। तीन साल पहले इन खंभों के नीचे की लोहे की परत इस वजह से गल कर आधी रह गई थी और इसे बदलना पड़ा था, लेकिन गुटखा खाने वाले वीरों ने इस लोहे को भी गला डाला है। गुटखे के थूकने से रंगीन सड़कें और सीढ़ियां तो सब ने देखी हैं और अक्सर अपने कपड़े बचाने की जरूरत भी पड़ जाती है जब अचानक चलती बस से कोई सज्जन गर्दन बाहर निकाल कर थूक देते हैं। लेकिन गुटखा बहादुरों के करतबों में यह नया अध्याय जुड़ा है कि वे हावड़ा ब्रिज के लोहे को भी गलाने में सफल हो गए हैं।
दरअसल गुटखा बनाने में तमाम नुकसानदेह रसायनों का प्रयोग किया जाता है, यह जानकार बताते हैं। सस्ते गुटखों में सुपारी को नर्म करने के लिए भी अम्ल का प्रयोग किया जाता है। इसलिए हमें उन लोगों की आंतों की मजबूती की दाद देनी होगी, जो उस गुटखे तक को पचा जाती हैं, जिसने हावड़ा ब्रिज के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। ऐसे ही लोगों के चलते गुटखे का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। कई राज्यों ने उस पर प्रतिबंध भी लगाया, फिर भी कुछ नहीं हुआ और हमारी सड़कों, दीवारों, सीढ़ियों को गंदा होने से बचाना नामुमकिन हो गया। गुटखा खाने वालों को आजादी का वह अहसास होता है, जिसके चलते वे कहीं भी थूक सकते हैं, जिसे बचना हो खुद बचे।
गुटखा भारतीय उपमहाद्वीप की खास ईजाद है लेकिन हमारे पड़ोसी देशों में खूब खाया जाता है। पाकिस्तान और भारत इस मामले में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण मसला हावड़ा ब्रिज का है। शायद कोई नहीं चाहेगा कि हमारा एक राष्ट्रीय स्मारक गुटखे की भेंट चढ़ जाए और हम पाएं कि एक दिन हावड़ा ब्रिज ढहा पड़ा है। यह भी हम नहीं चाहेंगे कि लोहे को गलाने वाले रसायन खा-खाकर लोग अपनी सेहत भी खराब करें। लेकिन निकट भविष्य में ऐसी कोई उम्मीद नहीं है कि ऐसी रक्तरंजित पिचकारियां बंद हों। अपनी दीवारों और सीढ़ियों को साफ रखने और हावड़ा ब्रिज को बचाने का कोई उपाय किसी को सूझता हो तो बताए।
दरअसल गुटखा बनाने में तमाम नुकसानदेह रसायनों का प्रयोग किया जाता है, यह जानकार बताते हैं। सस्ते गुटखों में सुपारी को नर्म करने के लिए भी अम्ल का प्रयोग किया जाता है। इसलिए हमें उन लोगों की आंतों की मजबूती की दाद देनी होगी, जो उस गुटखे तक को पचा जाती हैं, जिसने हावड़ा ब्रिज के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। ऐसे ही लोगों के चलते गुटखे का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। कई राज्यों ने उस पर प्रतिबंध भी लगाया, फिर भी कुछ नहीं हुआ और हमारी सड़कों, दीवारों, सीढ़ियों को गंदा होने से बचाना नामुमकिन हो गया। गुटखा खाने वालों को आजादी का वह अहसास होता है, जिसके चलते वे कहीं भी थूक सकते हैं, जिसे बचना हो खुद बचे।
गुटखा भारतीय उपमहाद्वीप की खास ईजाद है लेकिन हमारे पड़ोसी देशों में खूब खाया जाता है। पाकिस्तान और भारत इस मामले में प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, लेकिन महत्वपूर्ण मसला हावड़ा ब्रिज का है। शायद कोई नहीं चाहेगा कि हमारा एक राष्ट्रीय स्मारक गुटखे की भेंट चढ़ जाए और हम पाएं कि एक दिन हावड़ा ब्रिज ढहा पड़ा है। यह भी हम नहीं चाहेंगे कि लोहे को गलाने वाले रसायन खा-खाकर लोग अपनी सेहत भी खराब करें। लेकिन निकट भविष्य में ऐसी कोई उम्मीद नहीं है कि ऐसी रक्तरंजित पिचकारियां बंद हों। अपनी दीवारों और सीढ़ियों को साफ रखने और हावड़ा ब्रिज को बचाने का कोई उपाय किसी को सूझता हो तो बताए।
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