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प्रतीकों, भावनाओं और राजनेताओं के हितों पर आधारित राजनीति कितनी जटिल, दांवपेंच भरी और जनता से कटी होती है इसका संघनित रूप देखना हो तो महाराष्ट्र की राजनीति को एक उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है। वैसे तो महाराष्ट्र की राजनीति में क्षेत्रवाद, भाषावाद, राष्ट्रवाद, खेल, फिल्म और ग्लमैर के तमाम मुद्दे पहले से चल रहे थे, लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय कृषि और खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री शरद पवार ने रविवार को शिवसेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे से मुलाकात कर जो मराठा दांव चला है, उसकी धमक दिल्ली तक सुनाई दे रही है।
शरद पवार के बाल ठाकरे के आवास मातोश्री जाकर उनसे मिलने की प्रकट वजह तो यह रही है कि शिवसेना मुंबई में होने वाले आईपीएल मैच में आस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों को खेलने दे। दिखाने के लिए एक पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष की मौजूदा अध्यक्ष को लेकर की गई यह मुलाकात खेल की अंतरराष्ट्रीय भावना से प्रेरित कही जा सकती है। उन्होंने ठाकरे से कहा भी कि इस मैच में आस्ट्रेलिया के ज्यादा से ज्यादा एक-दो खिलाड़ी खेलेंगे इसलिए शिवसेना उसे तूल न दे।
एक लिहाज से यह आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रहे हमले की तनातनी के बीच आग पर पानी डालने का प्रयास भी लग सकता है। लेकिन हकीकत में यह पवार का मराठा दांव है जिसकी चर्चा कभी सावरकर ने नाना साहेब के संदर्भ में भी की है। पवार की इस मुलाकात से एक तरफ राहुल गांधी के मुंबई दौरे पर उठी बहादुरी और वाहवाही की हवा निकालना चाहते हैं और दूसरी तरफ उन कांग्रेसियों को जवाब देना चाहते हैं, जो महंगाई के कारण उन पर लगातार निशाना साध रहे हैं।
पवार की इस मुलाकात की कांग्रेस सहित कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टी सभी ने निंदा की है और इसे अनावश्यक बताया है। हालांकि बाद में कांग्रेस ने इसकी उपेक्षा करने की भी कोशिश की है पर पवार को जो संदेश देना था वे दे चुके। पवार की पार्टी के मुखपत्र ‘राष्ट्रवादी’ ने चीनी की महंगाई पर हल्ला मचाने वालों का मजाक उड़ाते हुए सलाह भी दे दी है कि चीनी कम खाएं, क्योंकि ज्यादा चीनी खाने से डॉयबटीज हो जाती है।
उधर कांग्रेस में यह मांग उठती रही है कि महंगाई पर यूपीए सरकार को परेशानी में डालने वाले पवार से क्यों न खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रलय ले लिया जाए और उनके पास महज कृषि मंत्रलय रहने दिया जाए। पवार दिल्ली, मुंबई और महाराष्ट्र की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं और उनके पास सासंद भले ज्यादा न हों पर उन्होंने कच्ची गोलियां नहीं खेली हैं। वे महाराष्ट्र की राजनीति और शिवसेना के उग्रवाद का इस्तेमाल बखूबी करना जानते हैं।
उन्होंने कांग्रेस को संदेश दे दिया है कि अगर वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनके पंख कतरेगी तो वे शिवसेना की संकीर्णता के माध्यम से मुंबई में चल रही मराठी बनाम गैर मराठी राजनीति की पीठ थपथपा कर कांग्रेस को चिढ़ाएंगे और उसे वह लाभ नहीं लेने देंगे जो वह बिहार और उत्तर प्रदेश में हिंदी वालों का हमदर्द बनकर लेना चाहती है। इस बीच यह कयास भी उठ खड़े हुए हैं कि वे शिवसेना के करीब भी जा सकते हैं। पर महाराष्ट्र राजनीति की जमीनी हकीकत अभी उन्हें शायद इतना आगे बढ़ने की इजाजत नहीं देती। उन्होंने मराठा दांव जरूर चला है पर पता नहीं यह दबाव का दांव है या आरपार का।

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