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प्लूटो का नाम करीब चार साल पहले चर्चा में आया था जब वैज्ञानिकों ने ग्रहों की परिभाषा पर पुनर्विचार किया था और प्लूटो को ग्रहों की गिनती से हटाकर ‘बौने ग्रहों’ की नई श्रेणी में डाल दिया था। दरअसल ग्रहों के लिए बने एक नए मानक पर प्लूटो खरा नहीं उतरा कि हर ग्रह की एक स्वतंत्र कक्षा होनी चाहिए। प्लूटो जब सूर्य का चक्कर लगाता है तो उसकी कक्षा नैपच्यून की कक्षा को काटती है। बहरहाल, प्लूटो फिलहाल फिर चर्चा में है, इसलिए कि उसका रंग बदल रहा है। उसका भूरा कत्थई रंग अब चमकदार लाल हो रहा है, इसकी वजह यह है कि प्लूटो का तापमान बदल रहा है।
जाहिर है प्लूटो की वार्मिग के पीछे मनुष्य या मनुष्य जैसे जीवों का कोई योगदान नहीं हो सकता जो कारखानों, खेतों और मोटरकारों से मीथेन और कॉर्बन डाइआक्साइड छोड़े, प्लूटो की वार्मिग पूरी तरह प्राकृतिक घटना है। इसकी वजह जानने के लिए हमें प्लूटो के बारे में कुछ तथ्यों को जानना होगा। प्लूटो आकार में हमारे चंद्रमा का एक तिहाई है और इसकी कक्षा अंडाकार है, इसलिए चक्कर लगाते-लगाते यह सूर्य के करीब आ जाता है और फिर दूर चला जाता है। जब यह सूर्य के करीब होता है तो इसकी सूर्य से दूरी करीब 400 करोड़ किलोमीटर होती है और जब दूर होता है, तब करीब 750 करोड़ किलोमीटर। जाहिर है दोनों स्थितियों में इसका तापमान अलग-अलग होता है, अब चूंकि वह सूर्य के पास आ रहा है, इसलिए इसका तापमान बढ़ रहा है।
बढ़ने का मतलब यह नहीं कि वहां गर्मी हो रही होगी। प्लूटो सूर्य से इतना दूर है कि बढ़ते हुए भी वहां का तापमान लगभग-180 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचेगा और घटते हुए-300 डिग्री सेल्सियस तक। जब तापमान घटता है तो उसके वायुमंडल की गैसें जम जाती हैं और बढ़ता है तो वे फिर गैस बन जाती हैं, यही प्रक्रिया अब चल रही है। वैसे प्लूटो को सूर्य का एक चक्कर लगाने में 246 वर्ष लगते हैं, जबसे हमने इसे खोजा है तबसे इसका एक चक्कर पूरा नहीं हुआ है।
हमारी धरती सूर्य से सिर्फ लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर है और हमारे लिए गर्मी और सर्दी के मायने अलग हैं। अगर हमारे यहां हिमयुग भी आ जाए तो वह प्लूटो के गर्म मौसम के मुकाबले बहुत ज्यादा गर्म होगा। लेकिन दूसरे ग्रहों की हलचलें हमारी जानकारी तो बढ़ाती हैं, साथ ही अपनी धरती के बारे में उपयोगी ज्ञान देती है। अब भी धरती के मौसम को प्रभावित करने वाले कारकों को हम पूरी तरह जान नहीं पाए हैं।
यह तो अनुभवसिद्ध है कि पर्यावरण की हानि के साथ मौसम का सीधा संबंध है, लेकिन इस संबंध की बारीकियों को जानना और दूसरे कारकों को ठीक से समझना अभी बाकी है। प्लूटो से हम अरबों किलोमीटर दूर हैं, इसलिए इसके बारे में भी हमारी जानकारी में धीरे-धीरे इजाफा होता रहा है और अक्सर पुरानी जानकारी को बदलने की भी जरूरत महसूस होती है।
लंबे वक्त तक प्लूटो के आकार प्रकार को लेकर भ्रम रहा, उसके वायुमंडल के बारे में भी जानकारी बेहतर होती रही। अब तक उसके तीन उपग्रहों के बारे में मालूम चला है, हो सकता है कि कुछ और भी खोजे जाएं। शताब्दियों से खगोलशास्त्री अंतरिक्ष के बारे में एक-एक तथ्य बरसों तक निरीक्षण करके और प्रयोगशालाओं में मेहनत करके जुटाते रहे हैं। यह ज्ञान एक छोटे से मानवप्राणी के क्षितिज को विस्तार देता रहा है।

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