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उत्तर प्रदेश विधानसभा में छात्रों की आत्महत्या का मामला उठाया गया और विधानसभा के अध्यक्ष ने इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है। मामला इतना गंभीर है भी, खबरों के मुताबिक लखनऊ में पिछले 23 दिनों में 20 छात्र-छात्राएं आत्महत्या कर चुके हैं। देखने पर यह लगेगा कि हर आत्महत्या के पीछे अलग कारण और अलग परिस्थितियां हैं। लेकिन जिन छात्रों ने जिंदगी की जंग में कदम ही नहीं रखा वे पहले ही हिम्मत हार जाएं, इसका गहरा विश्लेषण और व्यापक स्तर पर उपाय जरूरी हैं।
युवावस्था जोश और उम्मीदों की उम्र होती है और इस उम्र के इंसान के बारे में यह माना जाता है कि वह ऊर्जा और दमखम से भरा होगा। लेकिन जब इस जोश और इन उम्मीदों को बहुत भौतिक किस्म के पैमानों पर कसा जाता है तो ऊर्जा और दमखम टूटने लगता है। दिक्कत यह है कि हमने सफलता के बहुत ही व्यावहारिक और संकीर्ण किस्म के पैमाने बना रखे हैं। पढ़ाई में अव्वल रहना, अच्छे शिक्षण संस्थान में प्रवेश, अच्छी नौकरी, बहुत सारा पैसा, सुख-सुविधाएं, हमारे वक्त में सफलता के पैमाने बहुत सीमित हैं और सबसे बड़ा मूल्य सफलता ही है। ऐसे में जो इन पैमानों पर खरे नहीं उतरते, उनकी हिम्मत जवाब देने लगती है।
दूसरी ओर, जिस परिवार और समाज को एक सहारा और आसरा देना चाहिए, वह परिवार और समाज इन नौजवानों से उनकी उन असफलताओं का हिसाब मांगने लगता है, या कम से कम नौजवानों को यह महसूस होता है। ऐसे में किसी सहारे के तंत्र के बिना कई नौजवान अकेला महसूस करते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं। इसलिए आत्महत्या करने वाले छात्रों में बड़ी तादाद परीक्षा में असफल होने वाले या उम्मीद के मुताबिक सफलता न पाने वाले छात्रों की है। बाकी छात्रों की आत्महत्या भी कहीं न कहीं किसी असफलता या आक्रोश से जुड़ी है। एक न्यायपूर्ण और संवेदनशील शासन तंत्र या समाज एक बहुत बड़ा सहारा होता है, लेकिन समाज छात्र से सिर्फ अपेक्षाएं रखता है और शासन तंत्र और कुछ भी हो, संवेदनशील तो कतई नहीं है।
स्थिति गंभीर इसलिए है कि भारत में हर साल हजारों छात्र आत्महत्या करते हैं और साल-दर-साल इनकी तादाद बढ़ती ही जा रही है। जो आंकड़े उपलब्ध हैं, वे अपेक्षाकृत पुराने हैं लेकिन वे बताते हैं कि 2008 में लगभग 6000 छात्रों ने आत्महत्या की और यह तादाद दो साल में 35 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। भारत में दुनिया की 10 प्रतिशत आत्महत्याएं होती हैं और जनसंख्या के अनुपात में भी यह तादाद खतरे की ओर इशारा करती है, क्योंकि यह दर तेजी से बढ़ रही है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण इन सारे विभागों को मिल कर कोई नीति बनानी होगी, ताकि हमारे नौजवान कच्ची उम्र में हौसले से जिएं, हिम्मत न हार जाएं। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि समाज अपना रवैया बदले। हम लोगों के पास अभी तक पश्चिमी देशों जैसी समृद्धि नहीं है, न ही हमारे यहां उतने कुशल संस्थान है, लेकिन हमारी महत्वाकांक्षाएं वैसी हैं और समाज में अलगाव भी फैल रहा है। अगर हमारा समाज सिर्फ सफलता को एकमात्र पैमाना बनाता रहा तो हमारे नौजवान कुछ सार्थक करने की उम्मीद और हौसला लेकर नहीं जी पाएंगे। माता-पिता, मीडिया और समाज को यह देखना होगा कि कहीं हमारी सफलता की कामना हमारे ही बच्चों को तो नहीं खा रही है?

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