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संकीर्णता का मानस
First Published:03-02-10 10:42 PM
Last Updated:03-02-10 10:43 PM
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मराठी मानुष के नाम पर शुरू हुई संकीर्णता की राजनीति शांत होने का नाम ही नहीं ले रही है। गनीमत यही है कि अब इस राजनीति को राष्ट्रीय दलों की तरफ से भी चुनौती मिलने लगी है। चुनौती देने वालों में धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाली कांग्रेस तो है ही, हिंदुत्व की राजनीति करने वाली और शिवसेना की लंबे समय से सहयोगी रही भारतीय जनता पार्टी ने भी आवाज बुलंद कर दी है।

उससे भी अच्छी बात यह है कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शामिल करने के पक्ष में बोलकर निशाने पर आए फिल्मस्टार शाहरुख खान भी अभी तक मैदान में डटे हुए हैं। भले ही 12 फरवरी को रिलीज होने वाली उनकी फिल्म ‘माई नेम इज खान’ के पोस्टर फाड़े जाने शुरू हो गए हैं। इस लड़ाई को गौर से देखें तो यह खाली मराठी बनाम गैर मराठी की लड़ाई नहीं है। न ही यह मुंबई पर अपना हक जताने की लड़ाई है। 

यह सब तो महज प्रतीक हैं। यह सत्ता और वोट की संकीर्ण राजनीति का ऐसा एजंडा है, जो राष्ट्रवाद से लेकर क्षेत्रवाद, भाषावाद, प्रांतवाद और हर उस अस्मिता को संकीर्ण बना देता है, जिसमें किसी भी तरह से व्यापक समाज के हित का कोई दर्शन होता है। वह एक अस्मिता से दूसरी अस्मिता को अपने सत्ता संबंधी हितों के लिए जोड़ता है और उसी के लिए तोड़ता रहता है।

दरअसल यह उदार भारतीय बनाम संकीर्ण भारतीय की लड़ाई है। संकीर्णता को यह नहीं मालूम कि एक भारतीय कई तरह की अस्मिताओं के साथ जी सकता है और वह पाकिस्तान के प्रति भी अच्छा भाव रखते हुए उससे अपना विरोध प्रकट कर सकता है। संकीर्ण भारतीयता के खिलाफ उदार भारतीयता की यह लड़ाई चलनी चाहिए और इसमें फिल्म स्टार से लेकर राजनेता, मीडिया और सत्ता का जितना भी सहयोग मिले, उतनी जल्दी उसे परास्त करने में मदद मिलेगी।
   
लेकिन इसी के साथ हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस लड़ाई में हमें क्षेत्रीय और तात्कालिक स्वार्थ से ऊपर जाना होगा। कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इस मराठी बनाम गैर मराठी के विवाद में इसलिए कूदा है क्योंकि बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उसे अपने जनाधार की चिंता सता रही है। इसी प्रकार कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने अगर 26 नवंबर 2008 में शहीद होने वाले गैर मराठियों का जिक्र कर बाल ठाकरे को जवाब देने की कोशिश की है तो उन्हें भी बिहार में कांग्रेस को आगे बढ़ाने की चिंता है। लगे हाथ वे उत्तर प्रदेश के लोगों को भी खुश करना चाहते हैं। उनकी इन्हीं सीमाओं को भांपकर शिवसेना ने उनके बयान को मुंबई हमले में शहीद हुए मराठी पुलिस अधिकारियों का अपमान बताया है।

संकीर्णता कुतर्को पर चलती है और कला संस्कृति, भाषा और वेशभूषा जैसे भावनात्मक प्रतीकों से जूझते हुए अपनी राजनीति विकसित करती है। उसके प्रतीकवाद का जवाब एक हद तक प्रतीकों और तर्को के माध्यम से दिया भी जा सकता है। लेकिन वे प्रतीक न तो एकांगी होने चाहिए न ही तात्कालिक। अगर संकीर्णता को हराना है तो भाजपा ही नहीं, कांग्रेस को भी अपनी संकीर्ण राजनीति को हमेशा के लिए तिलांजलि देनी होगी। उन्हें स्वस्थ सामाजिक और आर्थिक विषयों को अपना एजेंडा बनाना होगा।

 
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