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समाजवादी विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया ने इतिहास-चक्र की जिस अवधारणा का बेहद मौलिक विवेचन किया है, लगता है वह चक्र समाजवादी पार्टी में तेजी से घूम रहा है। लोकसभा चुनाव में ताकत घटने और फिर फिरोजाबाद लोकसभा और विधानसभा के कुछ उपचुनावों में हार के बाद विधानपरिषद की हार ने जब इतिहास-चक्र को तेजी से घुमाया तो समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेताओं में विवाद और नई रणनीति की तलाश शुरू हो गई।
जाहिर है पार्टी अगर ढलान पर है तो उसके लिए एक हद तक वस्तुगत स्थितियां और उन्हें न समझ पाने वाले नेता जिम्मेदार होंगे। दोष और जिम्मेदारियों से संबंधित इसी जवाबी बयानबाजी का परिणाम है अमर सिंह और जयाप्रदा का निष्कासन। इतिहास इस समय इन नेताओं के विरुद्ध है तभी वे उस पार्टी से निकाल दिए गए जिसके वे सितारे हुआ करते थे।
समाजवादी पार्टी के मौजूदा विवाद को निजी और पारिवारिक विवादों के दायरे में देखा जा रहा है और आमतौर पर इस तरह से देखने पर चटपटी कहानियां बनती भी हैं। नेताओं के बयान भी यहीं से शुरू होते हैं, भले ही बाद में वे अंग्रेजी शिक्षा, कंप्यूटर, हिंदी के पूर्वाग्रह, स्त्री आरक्षण, अपराधीकरण और आधुनिकता के अन्य सैद्धांतिक विवादों की तरफ जाते हैं। अगर परिवार और निजी चारित्रिक दायरे से बाहर निकलकर समाजवादी पार्टी की मौजूदा उथल-पुथल को देखा जाए तो इस विवाद में दो धाराएं साफ दिखाई पड़ती हैं।
एक धारा वह है जो ग्रामीण, जातिसंघर्ष और धर्मनिरपेक्षता की देशी पृष्ठभूमि से अलग पार्टी को शहरी और फिल्मी चमक-दमक देने का दावा करती है। ऐसा करने वालों का मकसद फिल्मी सितारों के माध्यम से युवाओं को खींचना और इसी ग्लमैर पर सवार होकर राज करना है। वे कमजोर पड़ते फिल्मी सितारों को राजनीति से संरक्षण प्रदान करते हैं और बाद में उनका इस्तेमाल राजनीति में ग्लैमर पैदा करने के लिए करते हैं।
समाजवादी पार्टी ने अमिताभ बच्चान, जया बच्चान, जयाप्रदा, संजय दत्त और कभी राजबब्बर जैसे फिल्मस्टारों की शोभा यात्राएं इसी मकसद से निकालीं। इनमें राजबब्बर तो राजनीतिक रूप से सक्रिय भी रहे हैं पर बाकी स्टारों की राजनीतिक सक्रियता का कोई इतिहास नहीं रहा है। उनकी राजनीति संघर्ष, सेवा और विचारधारा जैसे पड़ावों से न गुजरी और न ही उसे उसकी कोई दरकार रही है। उनका उद्देश्य राजनीति और फिल्म के ग्लैमर से दमकते रथ पर सवारी करना रहा है। उन्हें मुलायम सिंह का साथ छोड़कर नरेंद्र मोदी के साथ जाने में भी कोई गुरेज नहीं है। लेकिन उत्तर भारत का राजनीतिक इतिहास यह साफ तौर पर बताता है कि यहां नेताओं का जलवा हमेशा फिल्मी सितारों से ज्यादा रहा है।
हिंदी फिल्मों के नायक-नायिकाओं को हिंदी इलाके ने कभी गंभीर राजनीतिक नहीं माना। अभी तक जो स्थितियां हैं उनसे यही लगता है कि मीडिया और विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक चैनल भले उन्हें भारी महत्व देते हों पर जनता उन्हें राजनीतिक आधार देने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ आंदोलन और विचारधारा से निकले पार्टी के वे नेता अब सक्रिय हो गए हैं जो ग्लैमर की चकाचौंध में दब गए थे। उन्होंने सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट एकता की भी बात की है। समाजवादी पार्टी का यह इतिहास- चक्र ग्लैमर से जमीन की तरफ जा रहा है, आगे के परिणाम उसी से तय होंगे।

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