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रहमान का सम्मान
First Published:01-02-10 10:07 PM
Last Updated:01-02-10 10:11 PM
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संगीतकार ए.आर. रहमान के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान कोई नई बात नहीं रही है, इसलिए उन्हें और उनके प्रशंसकों को उन्हें दो ग्रैमी पुरस्कार मिलने की खुशी तो बहुत होगी, आश्चर्य नहीं होगा। रहमान भारतीय संगीत के साथ-साथ विदेशी लोकप्रिय और शास्त्रीय संगीत से भी अच्छी तरह परिचित हैं और संगीत में आ रही नवीनतम टेक्नोलॉजी के भी वे उस्ताद हैं। जैसे वे मुंबई या चेन्नई के रिकार्डिग स्टुडियो में गानों की रिकार्डिग करवाते हैं, वैसे ही सहजता से लंदन में भी काम करते हैं।

लता मंगेशकर के लिए यह आश्चर्य था कि वे मुंबई के एक स्टुडियो में गा रही थीं और वह गाना लंदन के एक स्टुडियो में रहमान के निर्देशन में रिकार्ड हो रहा था। रहमान इस मायने में संगीत के ऐसे विश्व नागरिक हैं, जिनकी जड़ें भारत में हैं, इसलिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना बड़ा स्वाभाविक लगता है। रहमान का संगीत भी इस तरह का है कि उसे दुनिया के किसी भी कोने में सहज स्वीकार किया जा सकता है, उसका आधार भारतीय संगीत है, लेकिन उसकी ध्वनियां अंतरराष्ट्रीय हैं। रहमान भारतीय लोकप्रिय फिल्मी संगीत के सारी दुनिया में राजदूत हैं और यह अच्छा है कि उनकी वजह से इस संगीत को दुनिया भर में पहचाना जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि रहमान पहले संगीतकार हैं, जो भारत और पश्चिम का ऐसा संयोग कर पाए हैं। भारतीय फिल्म संगीत का शुरू से ही आधार यह रहा है और पहले के कई प्रतिभाशाली संगीतकार तरह-तरह के संगीत का बहुत सृजनात्मक मेल रच पाए हैं।

शंकर जयकिशन, अनिल विश्वास, मदनमोहन से लेकर आर.डी. बर्मन तक इसके उदाहरण हैं, मौजूदा लोगों में इलियाराजा एक बड़े संगीतकार हैं, जिनका असर रहमान पर भी दिखता है। पर पहले भारतीय फिल्मी संगीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उतना सुना नहीं गया था और संगीतकार भी इस दिशा में सोचते नहीं थे। कभी-कभार हमारे संगीत को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलती थी, वह भी सीमित थी, ‘आवारा हूं’ या ‘मेरा जूता है जापानी’ की रूस या चीन में लोकप्रियता इसका उदाहरण है।

रहमान का यह बड़ा योगदान है कि उन्होंने इस परंपरा में बने रहते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलवाई। हम उम्मीद कर सकते हैं कि रहमान को ‘ऑस्कर’ या ‘ग्रैमी’ मिलने के बाद भारत के लोकप्रिय संगीत की ओर भी दुनिया का ध्यान जाएगा, वरना अभी भारत की सांगितिक पहचान शास्त्रीय संगीत की वजह से ही है।

रहमान की सफलता का एक और फायदा यह हो सकता है कि भारत के युवा संगीतकार रहमान के अच्छे गुण सीखें। जैसे रहमान भारतीय और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के पारंगत हैं, इन दोनों क्षेत्रों में नए संगीतकार मजबूत नहीं हैं। रहमान टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के उस्ताद हैं, लेकिन वे बजाय इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों के मूल वाद्ययंत्रों की ध्वनियां इस्तेमाल करते हैं, यानी रहमान के गाने में बांसुरी या ढोलक की आवाज सचमुच की बांसुरी या ढोलक की होती है, इलेक्ट्रॉनिक सिंथेसाइजर से निकली आवाज नहीं होती।

वे जानते हैं कि संगीत का आधार तकनीकी लटके झटके नहीं, सुरीलापन है। उनका कोई गाना कानफाड़ शोर नहीं पैदा करता, मधुरता का रंग भरता है। रहमान अभी और आगे जाएंगे, और भारतीय संगीत को भी लोकप्रियता की नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे।

 
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