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मलेरिया का अर्थशास्त्र
First Published:31-01-10 09:48 PM
Last Updated:31-01-10 09:59 PM
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यूरोप से आए उपनिवेशवादियों का एशिया और अफ्रीका में जिन आपदाओं से सामना हुआ था, उनमें से एक मलेरिया भी था, इसीलिए उनके उस जमाने के लेखन में मलेरिया का जिक्र जरूर मिलता है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में डॉ. रोनाल्ड रॉस ने भारत में ही मलेरिया के परजीवी को खोज निकाला था और उसी शताब्दी में दक्षिण अमेरिका के एक पेड़ की छाल से मलेरिया की पहली कारगर दवा क्विनाइन या कुनैन निकाली गई, लेकिन मलेरिया नामक बीमारी अब भी सक्रिय है और बड़ी तादाद में लोगों को डंसती है।

बिल और मैलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने जिन बीमारियों की रोकथाम के लिए एक हजार करोड़ डॉलर यानी करीब पचास हजार करोड़ रुपए खर्च करने का ऐलान किया है उसमें से एक मलेरिया भी है। बिल गेट्स ने उम्मीद जताई है कि तीन साल में मलेरिया के टीके का इंसानों पर परीक्षण किया जा सकेगा। जिन बीमारियों को टीके के जरिए पूरी तरह से खत्म करने की कोशिश हो रही है, उनमें से एक मलेरिया है। यह बात बिल गेट्स ने भी कही है और कई विशेषज्ञ कहते आ रहे हैं कि दुनिया के गरीबों पर मलेरिया एक बहुत बड़ा बोझ है।

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर मलेरिया न हो तो हमारी विकास दर लगभग आधा प्रतिशत बढ़ जाएगी। इसकी वजह यह है कि मलेरिया से जितनी मौतें होती हैं, उससे कई गुना ज्यादा लोग शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं और लंबे वक्त तक अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाते। इलाज के खर्च के अलावा उत्पादकता में कमी गरीबों की आर्थिक स्थिति बिगाड़ देती है। कई अफ्रीकी देशों में मलेरिया की वजह से विकास दर में कमी और भी ज्यादा है।

मलेरिया की रोकथाम के लिए टीका जब बनेगा, तब बनेगा लेकिन दूसरे स्तरों पर इसकी कोशिशें ज्यादा बड़े स्तर पर करने की जरूरत है। मलेरिया का सीधा संबंध सार्वजनिक साफ-सफाई, पोषण के स्तर और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता से है, लेकिन हमारे यहां सालों साल मच्छर के काटने से होने वाली मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी बीमारियां न सिर्फ बड़ी जनसंख्या को तकलीफ पहुंचा रही हैं, बल्कि गरीबी में ज्यादा गहरे तक ढकेल रही हैं। अगर हम कई सारी ऐसी बीमारियों को नियंत्रण में कर लें, जिन पर नियंत्रण करने के लिए भारी संसाधनों की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और प्रशासनिक चुस्ती की जरूरत है तो हमारे देश में गरीबी कम करने के लिए कम मेहनत और पैसा खर्च करना होगा।

भारत में गरीबी की रेखा के ऊपर के लोगों को गरीबी की रेखा के नीचे ढकेलने वाले कई कारण हैं, उनमें से एक बड़ा कारण इलाज पर होने वाला खर्च है। इसे रोकने के लिए सस्ता इलाज उपलब्ध करवाना तो जरूरी है ही, उससे ज्यादा जरूरी है, बीमारियां कम से कम हों, इसका इंतजाम करना। जनस्वास्थ्य सेवाओं के मामले में बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश हमसे आगे हैं, इसकी वजह यह नहीं है कि उनके पास ज्यादा संसाधन हैं, बल्कि यह है कि उन्होंने अपने संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया है। बिल गेट्स जो कर रहे हैं, वह निश्चय ही बढ़िया काम है, लेकिन अपने देश के बच्चों को खसरे या मलेरिया से बचाने के लिए हम भी कुछ ज्यादा चुस्ती दिखा सकते हैं।

 
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