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न चुनौती से घबराता हूं, न समस्या से परेशान होता-हूं
First Published:12-11-11 08:29 PM
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बिहार में बदलाव का प्रतीक बन चुके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल एक और यात्रा पर हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद पिछले छह वर्षों में उनकी यह छठी यात्रा है। जिस तरह की उनकी सोच है, उसमें आने वाले वर्षों में नई यात्राओं की गुंजाइश बनी हुई है। पश्चिमी चंपारण जिले के गांवों से शुरू हुई इस यात्रा के दौरान हमारे राजनीतिक संपादक निर्मल पाठक की नीतीश कुमार से काफी अनौपचारिक माहौल में लंबी बात हुई। प्रस्तुत हैं उसी बातचीत के संपादित अंश:

बिहार में बदलाव के लिए हर तरफ तारीफ देख-सुनकर कैसा लगता है?
जब हम शासन में आए, तो समस्याओं का अंबार था। आतंक का राज था और शासन व विकास नदारद था। पहले कार्यकाल में हमने प्राथमिकता के आधार पर समस्याओं की पहचान की। सबसे पहला काम कानून का राज कायम करना था। इससे दहशत का माहौल खत्म हुआ, सद्भाव का वातावरण बना और चीजें ढर्रे पर आने लगीं। हमने दो ही बातें कही थीं। एक कानून का राज कायम करेंगे और न्याय के साथ विकास होगा। पंचायत के चुनाव हुए, महिलाओं व पिछड़ों में अति पिछड़ों को पहली बार आरक्षण मिला। इससे गरीब और वंचित तबके की शासन में भागीदारी बढ़ी और उनका भरोसा बना। इसके बाद हमने बुनियादी सुविधाओं सड़क, स्कूल और अस्पताल पर ध्यान दिया। इस सबसे काम का एक माहौल बना और नतीजा आपके सामने है। अब दूसरे कार्यकाल में डिलीवरी सिस्टम को सुधारना प्राथमिकता है।

तब क्या आपको लगता था कि बिहार में यह सब संभव है?
देखिए, असंभव कुछ भी नहीं है। निरंतर काम करते रहने की जरूरत है। हमने बहुत लंबे-चौड़े वायदे नहीं किए। हमारी कोशिश है कि लोगों की तकलीफ कम से कम हो। समस्याओं का अंबार है। आबादी का घनत्व ज्यादा है। कुछ कुदरती समस्याएं हैं। बाढ़ से हमारे यहां कुछ ज्यादा ही नुकसान होता है। लेकिन सबसे ज्यादा भरोसा मुझे बिहार के लोगों पर है। यहां की मिट्टी उपजाऊ है, युवा पीढ़ी बुद्धिमान है। इसी से भरोसा बनता है। कुछ खामियां तो हर जगह हैं।

बिहार में जो बदलाव आया, उससे आप खुद कितने संतुष्ट हैं?
मैं कभी संतुष्ट नहीं होता। आगे क्या करना है, मैं उसके लिए बेचैन रहता हूं। क्या नहीं हो पाया, मैं इसका हिसाब रखता हूं। जो हो गया, उसे याद नहीं रखता। सामने कोई चुनौती है, तो उसे अवसर में तब्दील करने की ख्वाहिश रहती हैं। मैं न चुनौती से घबराता हूं और न समस्याओं से परेशान होता हूं। लोगों से मिलने, उनकी तकलीफ दूर करने में मुझे संतोष मिलता है। आप कह सकते हैं कि मैं आत्मसंतोष के लिए काम करता हूं। लोग संतोष महसूस करते हैं, तो उसी में मेरी खुशी है। आखिर वे मांग क्या रहे हैं... सड़क, आंगनबाड़ी, स्कूल, अस्पताल...। आसमान से तारे लाने की बात तो कोई नहीं कह रहा।

एक बड़ी समस्या रोजगार की है। बिहार में उद्योग नहीं हैं और केवल कृषि पर निर्भरता है?
इसीलिए तो हम बिहार को विशेष दर्जा देने की मांग केंद्र से कर रहे हैं। अभी पूरी निर्भरता सरकारी निवेश पर है, पर निजी निवेश आएगा कैसे? उसे अगर कुछ सहूलियतें, रियायतें मिलेंगी, तभी राज्य में निजी निवेश की संभावनाएं बढ़ेंगी। बावजूद इसके लोगों को रोजगार नहीं मिल रहा, ऐसा नहीं है। हाल ही के आंकड़े बता रहे हैं कि बिहार से बाहर जाने वालों की संख्या कम हुई है। यह अपने आप में साबित करता है कि उन्हें यहां काम मिल रहा है, इसलिए बाहर नहीं जा रहे। पर सच्चाई यह है कि यह पिछड़ा राज्य है, इसे विशेष दर्जा दिए जाने की जरूरत है।

बिहार के लिए आपका कोई सपना है?
मैं चाहता हूं कि देश के किसी भी भाग में जब कोई व्यक्ति भोजन करे, तो उसकी थाली में बिहार का एक व्यंजन जरूर हो। हमारे यहां कृषि में अपार संभावनाएं हैं। कृषि कैबिनेट बनाना इसी सोच का हिस्सा है।

विकास के गुजरात और बिहार मॉडल में आपको क्या समानता दिखती है?
गुजरात व बिहार की कोई तुलना नहीं हो सकती। गुजरात हमेशा से विकसित और समृद्ध राज्य रहा है। महाभारत काल से। उसकी तुलना में बिहार गरीब और काफी पिछड़ा राज्य है। दोनों की भौगोलिक स्थिति में फर्क है। हां, बिहार हमेशा से ज्ञान का केंद्र रहा है। यहां से शिक्षा, संस्कृति और सद्भाव का संदेश गया है... बिहार से कभी धन का संदेश नहीं गया। फिर किसी भी राज्य के विकास की तुलना दूसरे राज्य के विकास से करना उचित नहीं। हम अपने हालात ध्यान में  रख विकास कर रहे हैं, दूसरे राज्यों की अपनी अलग परिस्थितियां हैं। हमारा जोर समावेशी विकास पर है।

पिछले कुछ समय से राजनेताओं पर लोगों का भरोसा कम क्यों हो रहा है?
इसके लिए हम लोग (पॉलिटिकल क्लास) ही जिम्मेदार हैं। कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। इसके लिए आचरण में, कथनी-करनी में फर्क सुधारना होगा। चुनावों में दूसरे को पछाड़ने के लिए अव्यावहारिक वायदे करने की होड़ लग जाती है। वायदे पूरे नहीं हो पाते और जनता का भरोसा टूटता है। इसलिए इस चीज को सुधारने की जरूरत है।

कुछ लोग कहते हैं कि सिविल सोसाइटी चुनाव लड़कर ही कानून बनाए?
मैं मानता हूं कि लोकतंत्र में सबको अपनी राय रखने का हक है। सबकी अलग-अलग भूमिका है। मैं नहीं मानता कि चुनाव लड़कर ही इस प्रक्रिया में शामिल हुआ जा सकता है। लेकिन सबको अपनी मर्यादा में रहने की जरूरत है।

क्या आपके साथ रहने का असर भाजपा पर पड़ा है?
बिहार में हम 1994 से साथ हैं। पहले समता पार्टी व भाजपा का तालमेल था, अब जनता दल (यू) और भाजपा का है। विवादास्पद मुद्दों को अलग रखकर यहां हम मिलकर विकास का काम कर रहे हैं। सांप्रदायिक सद्भाव बनाकर हम यहां न्याय के साथ विकास का प्रयोग कर रहे हैं। किसी और प्रयोग की गुंजाइश हमारे यहां नहीं है।

 
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