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आपकी जेब में सरकार का हाथ
सीताराम येचुरी, सांसद तथा सदस्य, माकपा पोलित ब्यूरो First Published:07-01-13 07:29 PM

केंद्र सरकार ने बड़ी तड़क-भड़क के साथ नव वर्ष पर अपनी चहेती कैश ट्रांसफर योजना को चालू कर दिया। पहले इसे ‘आपका पैसा आपके हाथ’ के नारे से प्रचारित करने की योजना थी। पर जब आलोचना हुई कि यह तो साल 2014 के चुनावों को ध्यान में रखते हुए जनता को रुपये-पैसे की रिश्वत देने का मामला है, तो उसके बाद योजना में काफी कुछ बदलाव किया गया। इसके तहत शामिल होने वाले जिलों की संख्या भी घटा दी गई। अभी इस योजना के दायरे में चुनिंदा 26 केंद्रीय योजनाएं शामिल की जाएंगी, जैसे विधवा पेंशन, अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों आदि के लिए छात्रवृत्ति की योजनाएं आदि। खाद्य, उर्वरक तथा मिट्टी के तेल की सब्सिडियों को फिलहाल इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा। लेकिन सरकार का मनसूबा यह है कि यह योजना अंतत: उसके द्वारा दी जाने वाली तमाम सब्सिडियों पर लागू हो जाएगी। हम इस योजना की कमजोरियों और सीमाओं की चर्चा तो बाद में करेंगे। सबसे पहला व गंभीर मसला यह है कि अभी इस योजना को कानूनी वैधता नहीं हासिल है। भारत का राष्ट्रीय पहचान प्राधिकार विधेयक-2010 अब तक संसद में विचाराधीन है। यह विधेयक तीन दिसंबर 2010 को राज्यसभा में पेश किया गया था और इसे छानबीन के लिए वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति को सौंप दिया गया था। समिति ने इसे नामंजूर करते हुए सरकार से आग्रह किया था कि इसकी खामियों को देखते हुए उसे नया विधेयक लाना चाहिए।

सरकार ने अब तक स्थायी समिति की रिपोर्ट पर अपनी राय जाहिर नहीं की है। उसने न तो कोई नया विधेयक लाने के लिए 2010 के विधेयक को छोड़ा है और न ही कोई संशोधित विधेयक पेश किया है। फिलहाल इस योजना को अगर शुरू किया गया है, तो आधार नंबर जारी किए जाने के लिए विधि व न्याय मंत्रलय द्वारा संसद से विधेयक पारित करने तक के लिए दी गई हरी झंडी के आधार पर ही यह किया गया है। विधि मंत्रालय का तर्क है कि कार्यपालिका की शक्तियों का दायरा विधायिका की शक्तियों के साथ-साथ चल सकता है और जो क्षेत्र किसी कानून के दायरे में नहीं हैं, उनमें सरकार द्वारा अपनी कार्यपालक शक्तियों का व्यवहार करने पर कोई पाबंदी नहीं है। दूसरी ओर, संसद की स्थायी समिति इससे अपनी असहमति जता चुकी है। वैधता के इस पहलू के अलावा भी इस तरह की व्यवस्था की कमजोरियों पर काफी विस्तार से बहसें चलती रही हैं। मिसाल के तौर पर, यूआईडीएआई ने बॉयोमेट्रिक उपकरणों की आपूर्ति का ठेका जिस 4-जी आइडेंटिटी सॉल्यूशन्स को दिया था, उसने खुद यह कहा है कि ‘अनुमान है कि किसी भी आबादी के लगभग पांच फीसदी हिस्से की हस्तरेखाएं चोट के निशान या बढ़ती उम्र या रेखाओं की अस्पष्टता के चलते पहचानी नहीं जा सकतीं।’

मनरेगा का हमारे देश का अनुभव पहले ही यह साबित कर चुका है कि खासतौर पर मेहनत-मजदूरी का काम करने वालों के मामले में उंगलियों की छाप की पहचान की विश्वसनीयता तथा उसकी सफलता की दर बहुत कम होती है।
इस योजना की दूसरी बड़ी कमी यह है कि यह व्यवस्था देश भर में काफी भरोसेमंद कंप्यूटर कनेक्टिविटी की मांग करती है। रिजर्व बैंक के गवर्नर सुब्बा राव तक ने 2012 के अगस्त के अपने भाषण में ऑन लाइन लेन-देन के लिए बॉयोमेट्रिक का जिक्र करते हुए कहा था: ‘इस तकनीक के पुख्ता होने की बात का साबित होना अभी बाकी है।’ तीसरी कमी, नकदी हस्तांतरण अंतत: लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचने हैं। भारत में इस समय ग्रामीण इलाकों में बैंकों की कुल 32,000 शाखाएं हैं, जबकि गांवों की संख्या लगभग छह लाख है। इतना ही नहीं, 1992 में हमारे देश में नव-उदारवादी सुधार शुरू होने के बाद से बैंकों की पूरी 2,600 ग्रामीण शाखाएं बंद की जा चुकी हैं। बैंकों की इस अनुपलब्धता को कथित रूप से बैंक प्रतिनिधि का रास्ता सुझाया जा रहा है, जिनके भरोसे बैंकिंग को ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचाने का जिम्मा छोड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह योजना बीच में फंड की चोरी को खत्म कर देगी और सब्सिडी का लाभ सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाना सुनिश्चित करेगी। लेकिन सच्चाई यह है कि इस सबके चक्कर में एक नया ही स्तर पैदा किया जा रहा है, जिसमें भ्रष्टाचार का खतरा कहीं ज्यादा है। इस योजना की पांचवीं खामी यह है कि आधार मूलत: पहचान स्थापित करने का कार्यक्रम है। लेकिन सब्सिडी के लाभ तो पात्रता के आधार पर दिए जाने हैं, न कि पहचान के आधार पर।

सच्चाई यह है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली समेत अनेक केंद्रीय योजनाओं के मामले में लाभ की पात्रता रखने वालों की संख्या का योजना आयोग का आकलन हमेशा ही संबंधित राज्य सरकारों के आकलन से भिन्न रहा है, बल्कि कई बार तो दोनों में बहुत भारी अंतर रहा है। इसलिए लोगों को लाभ के दायरे में रखने या न रखने का फैसला उनकी पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि गरीबी आदि की परिभाषाओं के आधार पर ही होना है। अक्सर कैश ट्रांसफर की सफलता के सबूत के तौर पर ब्राजील तथा मैक्सिको के उदाहरण दिए जाते हैं। लेकिन इन देशों में नकदी हस्तांतरण पहले से चली आ रही किसी सब्सिडी का विकल्प नहीं था। ये हस्तांतरण तो जनता को अतिरिक्त लाभ मुहैया कराने के कदम के रूप में आए थे।

वास्तव में, यूपीए-दो सरकार की इस नई योजना के पीछे का पूरा बुनियादी दर्शन ही यह है कि सरकार को धीरे-धीरे सामाजिक क्षेत्र की अपनी सभी जिम्मेदारियों से हाथ खींच लेना चाहिए। नकदी हस्तांतरण खुद-ब-खुद तथा लगातार, सरकार के सब्सिडी के अंश को घटाते जाएंगे। इसकी सीधी-सी वजह यह है कि जैसे-जैसे कीमत बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे जनता को नकदी हस्तांतरण के जरिए दी रही राशि की क्रय क्षमता घटती जाएगी। राजकोषीय घाटे को कम से कम रखने की कोशिश में यूपीए सरकार, सब्सीडियों का अपनी देनदारी घटाने के एक कारगर तथा असरदार तरीके के रूप में ही इस योजना को आगे बढ़ा रही है। इससे सभी कल्याणकारी कार्यक्रमों का निजीकरण करने में और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सरकार की पहले ही जिम्मेदारियां निजी हाथों में सौंपे जाने को वैधता प्रदान करने में मदद मिलेगी। याद रहे कि पूंजी के अपने मुनाफे अधिकतम करने के लिए, यह रास्ता खोला जाना भी बड़ी पूंजी की मांगों में शामिल रहा है। इस तरह यह डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजना, हमारी जनता के विशाल बहुमत की कीमत पर, पूंजी के निर्मम आदिम संचय के लिए एक और दरवाजा खोले जाने का भी रास्ता है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
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