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काफी जटिल है नाम जाहिर करने का मसला
एन के सिंह, टीवी पत्रकार First Published:07-01-13 07:28 PM

कानून और सामाजिक समझ या आकांक्षा में अक्सर सामंजस्य नहीं होता। कई बार कानून काफी आगे की सोच लेकर बनते हैं और समाज की तात्कालिक समझ से दूर हो जाते हैं। कईं बार कानून पुरानी दिकियानूसी सोच से बंधा रहता है जबकि समाज की समझ काफी आगे बढ़ चुकी होती है। यह टकराहट अक्सर अलग-अलग तरह से सामने आती है। अब बलात्कार के मामले को ही लें। इसके लिए बनाए गए प्रावधानों में एक अवधारणा यह थी कि अगर बलात्कार पीड़िता का नाम उजागर हो गया तो भारतीय कु-परम्परा के तहत उसे और उसके परिवार को ताउम्र बदनामी का दंश ङोलना पडेगा। न तो उस परिवार में शादियां होंगी न हीं उन्हें सामान्य जीवन में अच्छी नजरों से देखा जाएगा। केरल की एक पीड़ित महिला ने हाल ही में बताया कि उसके करीबी उससे मिलने तक नहीं आते। उसके पूरे परिवार का एक तरह से सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है। लेकिन पिछले महीने दिल्ली में हुए बलात्कार कांड के बाद कुछ लोग बलात्कार पीड़िता की छवि को कलंक से निकाल कर वीरांगना के रूप में प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं। बलात्कार के विरोधियों को सजा देने के लिए बन रहे नए कानून का नामकरण उस लड़की के नाम पर करने के बात तो एक केंद्रीय मंत्री भी कर रहे हैं। लेकिन पीड़िता का नाम उजागर न करने के कानून इसमें बाधा बन रहे हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत केवल तीन व्यक्तियों को बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करने का अधिकार है। पहला स्वयं पीड़िता को, दूसरा थानेदार या जांच अधिकारी वह भी तब जब ऐसा करना उसकी सदाशयता के तहत जांच के लिए जरूरी हो और तीसरा पीड़िता का सबसे नजदीकी रिश्तेदार को। यानी मीडिया या किसी अन्य को किसी भी कीमत पर नाम उजागर करने का अधिकार नहीं है। दिल्ली के बलात्कार कांड ऐसे ज्यादातर मामलों में मीडिया ने हमेशा ही इसका खयाल रखा है। फिलहाल जो मांग चल रही है, उसमें भी कई तरह के खतरे जुड़े हुए हैं। आज जन-भावनाएं पीड़िता को महिमामंडित कर देती है, पर कल यह भाव खत्म हो गया व समाज फिर से अपनी दकियानूसी सोच पर वापस आ गया, तो क्या उस परिवार को कलंकित होने का खतरा नहीं बढ़ जाएगा?

इस मामले में पीड़िता जिंदा नहीं है व जनाक्रोश का समाज पर प्रभाव है, इसलिए उसके महिमामंडित होने पर खतरे उतने नहीं हैं, पर क्या अन्य रेप-पीड़ितों के प्रति भी समाज यही भाव रखता रहेगा? दिक्कत यह है कि इस पर बहस के बजाए मीडिया का मुंह बंद करने की ही कोशिश चल रही है। एक टीवी चैनल के इंटरव्यू से पता चला कि बलात्कार पीडिता की जान बचायी जा सकती थी अगर तीन पीसीआर वैन इस बात पर न झगड़ते कि घटना किस थाने की सीमा में है। दिल्ली पुलिस को यह बात ही इतनी गैरवाजिब लगी कि टीवी चैनल पर मुकदमा ठोक दिया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
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