शुक्रवार, 29 अगस्त, 2014 | 21:33 | IST
  RSS |    Site Image Loading Image Loading
ब्रेकिंग
भारत-पाक के बीच प्लैग मीटिंग खत्मबीएसएफ, डीआईजी, पाक रेंजर्स की बैठकसीजफायर कायम रखने पर सहमतिआगे भी फ्लैग मीटिंग करने पर सहमतिसाढ़े तीन घंटे चली प्लैग मीटिंगधनबाद के गोविंदपुर के पास 2000 मवेशी लदे सौ ट्रक पकडे़ गए
 
प्रतिरोध के प्रतीकों में सिमट जाने के खतरे
सदानंद शाही, प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय
First Published:06-01-13 08:05 PM
 imageloadingई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ-

दिसंबर की आखिरी रात एक मोमबत्ती जुलूस में शामिल हुआ। यह जुलूस काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सिंह द्वार पर स्थित महामना मदनमोहन मालवीय की प्रतिमा से रात 12.00 बजे शुरू हुआ। जुलूस संत रविदास गेट तक गया और वहां से लौटकर महामना की प्रतिमा तक आया। जुलूस में कुछ अध्यापक, बीस-पच्चीस लड़कियां व दो सौ लड़के शामिल थे। मोमबत्तियां महामना की प्रतिमा के चारों तरफ लगा दी गईं। आयोजकों ने एक-दो वक्तव्य दिए व राष्ट्रगान के साथ रात एक बजे जुलूस विसर्जित हो गया। यह जुलूस दिल्ली में घटी गैंग रेप की घटना के विरुद्ध आयोजित किया गया था। रेप की घटनाएं आए दिन होती रहती है, पर दिल्ली की इस घटना के विरुद्ध पूरे देश में विरोध का जो माहौल बना, वह अभूतपूर्व है। मोमबत्तियों की कांपती हुई लौ से निकली रोशनी ने उम्मीद का एक वातावरण बनाया है। मोमबत्ती जुलूसों का जो सिलसिला निकल पड़ा, उसने बहुसंख्यक समाज को आंदोलित किया। नतीजा यह हुआ कि प्रतिरोध की चेतना मोमबत्ती जुलूस के प्रतीक में रूपांतरित हो गई। प्रतिरोध के प्रतीक में बदल जाने की दिक्कत यह होती है कि हमारी सक्रियताएं प्रतीकों से नियंत्रित होकर रह जाती हैं व चेतना में जो परिवर्तन होना चाहिए, वह होने से रह जाता है।

जिस जुलूस की मैंने चर्चा की, उसमें घटी एक घटना से मेरा ध्यान इस ओर गया। जब आयोजकों के वक्तव्य हो रहे थे, तब जुलूस में एक लड़की ने जबरदस्ती घुसकर अपनी बात कही। उसने कहा कि जिस प्रवृत्ति के खिलाफ हमने जुलूस निकाला, उसके लक्षण यहीं प्रकट हो रहे हैं। बार-बार कहा जा रहा था कि लड़कियां लड़कियों में रहें। यानी स्त्री स्वाभिमान व सम्मान के सवाल पर आयोजित इस विरोध-प्रदर्शन में भी आशंका बनी हुई है और लड़कियों की भलाई लड़कियों के साथ रहने में है। कुल मिलाकर लड़की ने हमारे समाज में मौजूद उस पाखंड की ओर ध्यान दिलाया, जिसके सहारे हम एकदम विरोधी विचारों से जीवन में तालमेल स्थापित कर लेते हैं। स्त्री सम्मान के लिए हो रहे विरोध प्रदर्शन में भी शामिल हो लेते हैं और ऐसी हरकतों में भी शामिल हो जाते हैं, जो स्त्री सम्मान की राई-छाई करने वाला होता है।

हाल में शशि थरूर ने बयान दिया कि हादसे की शिकार लड़की हमारे बीच नहीं है, इसलिए उसका नाम छिपाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि नए कानून को उस लड़की का नाम देकर उसे सम्मान देना चाहिए। जब से यह बयान मीडिया में आया है, कुछ लोग इसे लेकर राजनीति करने लगे। राजनीति इतनी प्रौढ़ कब होगी कि विरोधी की कही सही बात का स्वागत कर सके? मेरे विचार से यह सार्थक सुझाव है। दुर्व्यवहार का शिकार सामाजिक रूप से लांछित व अपमानित क्यों महसूस करे व दुर्व्यवहार करने वाला गौरवान्वित? हम ऐसा पाखंड मुक्त समाज क्यों नहीं बना सकते, जिसमें बर्बर को बर्बर कहा-समझा जा सके?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 imageloadingई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ- share  स्टोरी का मूल्याकंन
 
टिप्पणियाँ
 

लाइवहिन्दुस्तान पर अन्य ख़बरें

आज का मौसम राशिफल
अपना शहर चुने  
धूपसूर्यादय
सूर्यास्त
नमी
 : 05:41 AM
 : 06:55 PM
 : 16 %
अधिकतम
तापमान
43°
.
|
न्यूनतम
तापमान
24°