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कुएं में फंसा चांद
अमृत साधना
First Published:06-01-13 08:03 PM
क्या कभी चांद कुएं में फंस सकता है? यह सुनकर हंसी आती है, लेकिन हम सब इसी तरह व्यवहार करते हैं, जैसे चांद कुएं में उतरकर फंस गया हो। फिर हम बहुत दिमाग लड़ाते हैं, ताकि चांद को निकाल सकें। हम सब उस नासमझ आदमी की तरह हैं, जो एक चांदनी रात सुनसान रास्ते से गुजरा। उसने एक कुएं में झांककर देखा, उसमें चांद की परछाईं थी। उस पागल ने सोचा, बेचारा चांद कुएं में कैसे गिर पड़ा! क्या करूं? न मालूम कहां से एक रस्सी ले आया बेचारा। कुएं में उसे फेंका, फंदा बनाया, चांद को फंसाया। चांद फंसा नहीं, चांद तो वहां था ही नहीं, लेकिन एक चट्टान फंस गई! वह जोर से रस्सी खींचने लगा। उसे लगा, चांद बड़ा वजनी है। पागल रस्सी खींचता रहा, खींचता रहा, आखिर फंदा टूट गया और वह चारों खाने चित। कराहते हुए आखें खोलीं, तो ऊपर देखा, चांद आकाश में भागा चला जा रहा है! उसने कहा, चलो बचा दिया बेचारे को! मुझको चोट लगी-तो लगी, चांद तो मुक्त हो गया।
वह आदमी जितनी बेवकूफी कर रहा था, उतनी ही बेवकूफी सामान्य आदमी भी करता है, जब वह सोचने लगता है कि वह संसार में फंस गया है। सभी बुद्ध पुरुषों का एक ही कहना है कि तुम चांद हो, कुएं में कैसे गिर सकते हो?
ओशो कहते हैं, ‘सत्य यह है कि मनुष्य कभी फंसा ही नहीं है। वह जो हमारे भीतर है, वह निरंतर मुक्त है, वह किसी बंधन में कभी नहीं फंसा है। लेकिन परछाईं फंस गई है। और हमें पता ही नहीं कि हम उससे ज्यादा भी हैं!’
इसीलिए ध्यान करने का इतना आग्रह है। कोई ध्यान में गहरे जाए, तो लगता है कि गहरे कुएं में उतर रहे हों। उतरते-उतरते पता चलता है कि हम तो खाई के बाहर हैं, क्योंकि हम देख रहे हैं। इस संसार को देखने भर से ज्ञात होता है कि हम तो संसार में फंसे ही नहीं, व्यर्थ परेशान हो रहे हैं।
ओशो कहते हैं, ‘सत्य यह है कि मनुष्य कभी फंसा ही नहीं है। वह जो हमारे भीतर है, वह निरंतर मुक्त है, वह किसी बंधन में कभी नहीं फंसा है। लेकिन परछाईं फंस गई है। और हमें पता ही नहीं कि हम उससे ज्यादा भी हैं!’
इसीलिए ध्यान करने का इतना आग्रह है। कोई ध्यान में गहरे जाए, तो लगता है कि गहरे कुएं में उतर रहे हों। उतरते-उतरते पता चलता है कि हम तो खाई के बाहर हैं, क्योंकि हम देख रहे हैं। इस संसार को देखने भर से ज्ञात होता है कि हम तो संसार में फंसे ही नहीं, व्यर्थ परेशान हो रहे हैं।
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