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पूर्व केंद्रीय मंत्री अजित सिंह ने सरकारी आवास खाली कर दिया है।
 
नए द्वार खोलने का वक्त
शशि शेखर shashi.shekhar@livehindustan.com
First Published:05-01-13 10:25 PM
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नए साल का पहला हफ्ता खत्म होने को है और भारत के बुद्धिजीवियों को यह चिंता सता रही है कि रह-रहकर उफन पड़ने वाला जनाक्रोश इस वर्ष ठंडा पड़ेगा या और उग्र होगा? लोग चकित हैं। उन्होंने सोचा भी न था कि पुरानी व्याख्याएं और मान्यताएं अचानक यूं धराशायी हो जाएंगी। अन्ना हजारे, बाबा रामदेव या केजरीवाल जैसे लोगों ने जब आंदोलन का आह्वान किया, तो यह मान लिया गया था कि इनके पीछे राजनीति है। चुनावों से पहले कई बार इस तरह के करतब संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र की जनता ने देखे हैं। इसीलिए हर मतदान के बाद उन्हें यह अफसोस सालता रहा है कि वे एक बार फिर ठग लिए गए। सियासत के सूरमाओं ने कभी मतदाता के इस आक्रोश को भाव नहीं दिया। मैंने अक्सर नेताओं को यह कहते सुना है कि चुनाव तो ‘लहर’ पर जीते जाते हैं। यही वजह है कि वे हर इलेक्शन से पहले अपने-अपने हिसाब से लहर पैदा करने की कोशिश करते रहे हैं। जिस तरह समुद्र में तट की ओर आई हुई ‘लहर’ पूरे तौर पर वापस नहीं जाती, वैसे ही यह माना जाता है कि ‘चुनावी लहरें’ ज्वार-भाटे की तरह होती हैं। पर इस बार तो गजब हो गया। पिछले लगभग दो साल से देश के नौजवानों की बेचैनी सड़कों पर उफन और उतर रही है। यह चिंताजनक है।

अब यह सोचना गलत होगा कि पुराने टोटकों से काम चल जाएगा। सत्ता का खेल रचने वाले राजनेताओं को अपनी यह गलतफहमी भी दूर करनी होगी कि आम आदमी की याददाश्त कुंद होती है। वह बहुत जल्दी सियासी वायदे और दावे भूलकर रोजी-रोटी के जुगाड़ में लग जाता है। गुजरे तीन हफ्ते इस बदलाव को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। पिछले दिनों नई दिल्ली में एक युवती के साथ बलात्कार के बाद जैसा आक्रोश फैला, वह अभूतपूर्व था। मुल्क का ऐसा कोई भी बड़ा शहर नहीं था, जो इससे अछूता रहा हो। राजधानी में तो कमाल ही हो गया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन में घुसने की कोशिश की और 17 दिसंबर, 2012 से विरोध का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अब तक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसी का परिणाम है कि दिल्ली पुलिस ने आनन-फानन में अपराधियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार की। अब मुकदमे की रोजाना सुनवाई होगी और इसे जल्दी से जल्दी मुकाम तक पहुंचाया जाएगा।

यह जन दबाव का ही कमाल था कि जिस देश में हर रोज इलाज के अभाव में सैकड़ों लोग मर जाते हैं, वहां पीड़िता को उपचार के लिए सिंगापुर भेजा गया। दुर्भाग्यवश उसकी प्राण रक्षा नहीं हो सकी। उसका पार्थिव शरीर जब नई दिल्ली वापस लाया गया, तो खुद प्रधानमंत्री और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी हवाई अड्डे पर मौजूद थे। आगे से ऐसी घटनाओं पर अंकुश लग सके, इसके लिए कड़े कदम उठाए जाने की वकालत हो रही है। आला नौकरशाह कड़े कानूनों के साथ और भी कारगर तरीके ढूंढ़ने की कोशिशों में जुटे हैं। कोई हेल्पलाइन खोल रहा है, तो कोई महिला पुलिसकर्मियों में बढ़ोतरी करने की घोषणा कर रहा है।

क्या यह आक्रोश सिर्फ एक बलात्कार का विरोध करने के लिए फैला, जिसने सरकारी मशीनरी को उठकर खड़ा होने पर मजबूर कर दिया? आंकड़ों की दृष्टि से इस पर सहमति जताई जा सकती है। हमारा देश महिलाओं से बलात्कार के मामले में संसार का सिरमौर बन गया है। 1971 में जहां देश भर में बलात्कार की 2,487 घटनाएं दर्ज की गई थीं, वहीं 2011 में यह आंकड़ा 24,206 तक पहुंच गया। इन 40 सालों में इस जघन्य अपराध में  लगभग 10 गुनी बढ़ोतरी हुई है, जबकि होना उलटा चाहिए था। जैसे-जैसे देश ने तरक्की की राह पकड़ी, वैसे-वैसे अपराधों की दर में भी कमी आती। पर करें क्या? जिन नागरिकों के वोटों से सरकारें चुनी जाती हैं, उन्हीं के लिए उनका रवैया उपेक्षा भरा होता है। यही वजह है कि लोकतंत्र का कोरस गाते-गाते लोग अब आजिज आकर चिल्लाने लगे हैं। उन्हें कुशासन और उपेक्षा बर्दाश्त नहीं, इसीलिए नौजवानों का यह देश पिछले कई महीनों से सिर्फ उबलता हुआ दिख रहा है। नई दिल्ली का बलात्कार प्रकरण इसका नवीनतम कारण था। आगे कोई और वजह उभर सकती है।

अब तक सारे उबाल कमोबेश अहिंसक और शांतिपूर्ण रहे हैं, पर हमेशा ऐसा बना रहेगा, यह सोचना नादानी होगी। दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा की मांग को लेकर अमन भरे आंदोलन को कुछ असामाजिक तत्वों ने हथियाने की साजिश रची थी। वे कुछ हद तक ही सफल हो सके। इसे सौभाग्य माना जा सकता है और संयोग भी, पर हमेशा ऐसा हो, इसकी गारंटी तो नहीं?

आंदोलनों के इस अभूतपूर्व दौर ने साबित कर दिया है कि अब सत्तानायकों को अपना चाल, चरित्र और चेहरा बदलना होगा। सशस्त्र अंगरक्षकों के बूते अपनी आरामगाहों में महफूज हुक्मरां आम आदमी को उसकी गुरबतों के साथ जीने के लिए छोड़कर अब चैन से नहीं बैठ सकते। यह मान लेना बेवकूफी होगी कि भारत क्रांतियों का देश नहीं है। यहां छोटे देशों की तरह आनन-फानन में कुछ नहीं हो सकता, पर बदलाव एक सतत प्रकिया है। हमारे यहां जो लोग 31 दिसंबर की रात अपनी उत्सवधर्मिता को धकिया कर जाड़ा-पाला झेलते हुए धरने पर बैठे थे, उन्हें क्या कहेंगे आप? क्या वे परिवर्तन के सूत्रधार नहीं हैं? हमें यह भी याद रखना होगा कि सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत के इस जमाने में, जब दुनिया सचमुच एक चौपाल में तब्दील होती नजर आ रही है, जीवन, जय और जागृति को नकारना असंभव है। वे दिन हवा हो गए, जब गुजरात में छात्र आंदोलन करते थे और उनका दमन करने के लिए पुलिस को बर्बर तरीके आजमाने के लिए छुट्टा छोड़ दिया जाता था। इसी तरह थ्येन आन मन चौक पर अपने ही बच्चों की बलि चढ़ाने को चीन की सरकार स्वतंत्र थी। सोशल मीडिया ने हुकूमतों के आत्मघाती चैन और आक्रामक रवैये के रथ की रास थाम ली है। अब हर घटना की प्रतिक्रिया होती है।

इसीलिए अमेरिका में बढ़ती बदहाली के खिलाफ अगर कुछ नौजवानों और संवेदनशील लोगों ने ‘ऑक्यूपाई वालस्ट्रीट’ आंदोलन चलाया, तो उसका असर धरती के अन्य महाद्वीपों पर भी दिखाई पड़ा। छल-बल के जरिये दशकों से सत्ता में काबिज अपने तानाशाहों के खिलाफ जब पश्चिम एशिया के नौजवानों ने आवाज उठाई, तो सिर्फ वहीं सत्ता परिवर्तन नहीं हुए, अन्य देशों पर भी उसका प्रभाव पड़ना लाजिमी था। बारीकी से देखिए। वालस्ट्रीट, इंडिया गेट और जंतर-मंतर के धरनों में आपको समानता दिखाई पड़ेगी। हर जगह नौजवानों ने अगुवाई की। सभी शांतिपूर्वक अपनी बात कहना चाहते थे और सिस्टम को ओवरहॉल करना उनका साझा मकसद था। तो क्या हम 2013 से यह नेक उम्मीद कर सकते हैं कि वह सह-जीवन और सह-अस्तित्व के लिए कुछ नए दरवाजे खोलेगा, ताकि विश्वव्यापी छटपटाहटों को कुछ सुकून मिल सके?

 
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