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भारतीय संस्कृति का स्याह कोना
सन्नी हुंदाल, भारतीय मूल के ब्रिटिश पत्रकार First Published:04-01-2013 07:36:02 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

साल 2013 के आंगन में हमारे कदम रखने के चंद रोज पहले की बात है, हनी सिंह नाम का एक भारतीय-पंजाबी रैपर अचानक ही हिन्दुस्तान में विवादों का केंद्र बन गया। उसके खिलाफ इतना जबर्दस्त ऑनलाइन अभियान चला कि दिल्ली में उसके संगीत कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा। वाकई, जिन गीतों को गाने के आरोप हनी सिंह पर हैं, उनके बोल बेहद घिनौने व अपमानजनक हैं। (इन गीतों में बलात्कार के कुकृत्य को लेकर तरह-तरह की छिछोरी कल्पनाएं की गई हैं) हालांकि, हनी सिंह का कहना है कि ये उसके गीत नहीं हैं। लेकिन इस हंगामे ने कई बड़े सवालों को जन्म दिया है- आखिर इस तरह के गीतों को रचने और गाने वाला शख्स इतना लोकप्रिय कैसे हो गया? और फिर बॉलीवुड ने उसे सबसे महंगे गीतकार के तौर पर स्वीकार भी कैसे किया? जब कभी भी यह आरोप लगता है कि हिन्दुस्तानी तहजीब ने औरतों की इज्जत करना नहीं सीखा, तो ज्यादातर भारतीय फट पड़ते हैं। उनकी दलील यही होती है कि हमारी संस्कृति नारीत्व का भरपूर सम्मान करती है, बल्कि वे स्त्री की महिमा बखानते-बखानते उसे प्रकृति के रूप में पेश करने लगते हैं और ‘मदर अर्थ’ और ‘मदर इंडिया’ जैसे विशेषण दे डालते हैं। वे आपको कुछ यों शेखी बघारते हुए मिल जाएंगे कि हमने तो 1966 में ही एक महिला (इंदिरा गांधी) को अपने देश का प्रधानमंत्री चुन लिया था और हमारे कई सूबों में औरतें आज भी हुकूमत की बागडोर संभाल रही हैं। हमारे पास विदुषियों, महिला बौद्धिकों, लेखिकाओं व खिलाड़ियों की एक लंबी और समृद्ध सूची है।

एक बेहद लोकप्रिय भारतीय त्योहार ‘राखी’ में सभी भाई अपनी-अपनी बहनों को जीवन भर तक उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं। भारतीय संस्कृति पर सबसे अधिक छाप हिंदू मिथकों, पौराणिक-कथाओं की हैं। इन मिथकों से जुड़ी ऐसी अनेक कहानियां आपको मिलेंगी, जिनमें मुसीबत में फंसी कुवांरी कन्याओं को बचाने के लिए राजा स्वर्ग से धरती पर उतर आए या फिर उन्होंने धरती से स्वर्ग तक का सफर किया। लेकिन ये प्रतीक भी सुविधाजनक आडंबर हैं, जिनकी आड़ में भारतीय संस्कृति एक खास तरह की हिंसा को अपने भीतर समाहित करती है। दरअसल ये प्रतीक भी इसी झूठ का हिस्सा हैं कि भारत में औरतें कभी बुरी हालत में नहीं पहुंच सकतीं, क्योंकि यहां उन्हें काफी आदर हासिल है। मगर हकीकत इसके ठीक उलट है। पारंपरिक हिन्दुस्तानी संस्कृति में लड़कियों को इस तरह से बड़ा किया जाता रहा कि वे एक बेहतर बीवी साबित हो सकें। उनका अपना कैरियर हो, वे अपने पैरों पर खड़ी हों, इसकी सलाहीयत उसमें नहीं थी।

उसके पारंपरिक मूल्य यही कहते रहे हैं कि औरतें अपने हुकूक के कारण नहीं, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे जननी हैं और संस्कृति को संरक्षित रखती हैं। यही सोच, यही मानसिकता औरतों को एक वस्तु के रूप में देखने के लिए परिवारों को प्रेरित करती है और परिवार अपेक्षा करते हैं कि स्त्रियां अपनी शुचिता बनाए रखें तथा एक सीमित दायरे के बाहर न निकलें। औरत या तो पिता की संपत्ति है या फिर पति की। भारतीय पिता अपनी बेटियों को लेकर बेहद चिंतित रहते हैं कि कहीं उनके किसी कृत्य से समाज में ‘मुंह छिपाने’ की नौबत न आ जाए, जबकि परिवार के बेटों को हर उस काम की छूट होती है, जो वे करना चाहते हैं। लड़कियों को कदम-कदम पर सलाह दी जाती है कि वे ऐसा कोई काम न करें, जिसके कारण परिवार को ‘शर्मिदगी’ का शिकार बनना पड़े। इसी मानसिकता के कारण लड़कियों पर शादी के लिए दबाव डाला जाता है और कई बार तो अपने अभिभावकों के हाथों ही वे मारी जाती हैं।

बालीवुड फिल्मों में मर्द लगातार औरतों का उत्पीड़न करते हैं। जैसा कि एसए अय्यर ने हाल ही में एक प्रतिष्ठित अखबार में यह बताया है कि अपने समय के चर्चित खलनायक रंजीत ने परदे पर बलात्कार के करीब 100 सीन किए हैं और लगभग हर बार दर्शकों ने उन दृश्यों पर सीटियां बजाईं और रंजीत के काम को सराहा। आखिर बॉलीवुड ने क्या संदेश दिया? इसलिए दिल्ली की छात्र के साथ गैंग रेप और हत्या की घटना कोई अकेली वारदात नहीं है। भारतीय औरतों की दास्तां सुनकर कोई भी संजीदा इंसान चिंतित हो उठेगा कि वे किन खौफनाक स्थितियों में जी रही हैं और वाकई हिन्दुस्तानी तहजीब इस हालत में क्यों है? हम सभी को, जिसमें मुझ जैसे भारतीय मूल के लोग भी शामिल हैं, अपने आप से पूछना चाहिए कि आखिर हम इस हश्र को क्यों पहुंचे? हिंसा की ये घटनाएं यकीनन औरतों के लिए पीड़ादायक हैं, लेकिन लगातार बढ़ती ये घटनाएं क्या भारतीय पुरुषों की मानसिक स्थिति के बारे में भी हमें नहीं बतातीं?

स्त्रियों के खिलाफ हिंसा एक सांस्कृतिक समस्या है। किसी भी मुल्क की संस्कृति ही वहां के कानूनों की शक्ल तय करती है और समाज में हिंसा के अस्तित्व को नकारती या उसे बढ़ावा देती है। आखिर क्यों नहीं भारत में 10 करोड़ महिलाओं के गुमशुदा होने के कारण पैदा हुए सामाजिक असर पर कोई राष्ट्रीय बहस छिड़ती है? इस तरह के मसलों को अक्सर दबा दिया जाता है। और सिर्फ हिन्दुस्तानी मर्द ही ऐसा नहीं करते, बल्कि कुछ पश्चिमी लोग भी ऐसा करते हैं। पिछले दिनों यूनिवसिर्टी ऑफ लंदन में अतिथि लेक्चरर एमर ओ टूले ने अपने लेख में भारतीय राजनेताओं की संवेदनशीलता की जमकर तारीफ की, जबकि ज्यादातर प्रदर्शनकारी नेताओं की काहिली और संवेदनहीनता की आलोचना कर रहे थे।

भारत को अपने बचाव के लिए सदाशयी गोरे लोगों की जरूरत नहीं है, उसे बस हिन्दुस्तानी औरतों की आवाज सुनने की दरकार है। हमें इस बात को मानने में कोई हिचक नहीं कि दुनिया के लगभग हर इलाके में औरतों के उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं तथा उन्हें अंजाम देने के तरीके व सामाजिक पृष्ठभूमि में कोई खास फर्क भी नहीं है। महिलाओं के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों के इस तर्क में वाकई दम है कि चूंकि औरतों में जागृति आ रही है और वे यौन-उत्पीड़न के खिलाफ अब रिपोर्ट दर्ज कराने लगी हैं, इसलिए बहुत सारे पुरुषों को यह पच नहीं रहा है और वे साहसी स्त्रियों को सबक सिखाने के लिए बर्बर तरीके अपना रहे हैं। हिन्दुस्तान में बहादुर लड़कियों, औरतों की कोई कमी नहीं है। इसके पास आजाद शख्सीयत रखने वाली अनगिनत आर्दश महिलाएं भी हैं, लेकिन इन महिलाओं ने सांस्कृतिक कसौटियों से लड़कर अपना व्यक्तित्व गढ़ा है, सांस्कृतिक मान्यताओं ने उनकी मदद नहीं की है। इसलिए औरतों के खिलाफ हिंसा की यह महामारी तब तक खत्म नहीं होगी, जब तक मर्दवादी मानसिकता की जड़ों पर चोट नहीं की जाती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)     
साभार: द गाजिर्यन

 

 
 
 
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