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इस सूर्योदय की सलामी में
उर्मिल कुमार थपलियाल First Published:04-01-13 07:34 PM

एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह, बारह, तेरह.. नाच नाचकर माधुरी दीक्षित कब से बुला रही थी। अब जब सन तेरह आ गया, तो माधुरी खुद सीन से गायब हैं। इससे तो यही सिद्ध होता है कि हरजाई कभी रजाई नहीं ओढ़ते, ताकि जब चाहें, दगा देकर निकल लें। यह तो तय है कि अब की बार के जाड़ों में युवा आक्रोश ने पुलिस व प्रशासन, दोनों को कनटोपा पहना दिया है। भ्रष्टाचार वाले एजेंडे में अब बलात्कार है। सरकार ने भी बता दिया है कि कैरेक्टर जाए भाड़ में, इन दिनों पॉलिटिकली करेक्ट होना जरूरी है। नए साल की बलिहारी है। मधु-कैटभ व शुंभ-निशुंभ तक कुंभ नहाने जा रहे हैं। क्या सपा, क्या बसपा। सरकार से खफा होने पर दोनों का नफा। विपक्ष का आचरण ही यही है कि ‘कथनी, करनी गायब बातें बड़ी-बड़ी। भुस में आग लगाय जमालो दूर खड़ी।’ हमारे देश के राजनीतिक वयोवृद्धों का क्या? एन डी तिवारी का कहना है कि- ‘गो हाथ में जुंबिश नहीं, आंखों में तो दम है। रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे।’ कुछ राजनेता होते हैं, जिनका बुढ़ापा कथक महाराजों जैसा मजे से कटता है।

सन चौदह को देखते हुए राजनीति की कोचिंग क्लासेज शुरू हो गई हैं। कुछ सनकी और व्यवस्था विरोधी नारेनुमा गीत गाने में लगे हैं कि ‘जिस देश में बकैती रहती है। जिस देश में दंगे रहते हैं। हम उस देश के वासी हैं। जिस देश में नंगे रहते हैं।’ अब ऐसे विघ्नसंतोषियों का जब फास्ट फूड कुछ नहीं कर सका, तो फास्ट ट्रैक क्या कर लेगा?
कुछ भी हो, नए साल के पांव भारी लगते हैं। लगता है कि युवा शक्ति सरकार के आसमान में धान बोकर रहेगी। चिराग का जिन्न बाहर निकला है, तो कुछ न कुछ तो करेगा ही। यह तो उत्तर आधुनिक उत्साह है, जो जड़ीले शलजमों को उखाड़ने में लगा है। कृष्ण भले ही अपनी द्वारिका में बिजी हों, लेकिन इस बार उन्हें फिर से कौरव सभा में कांपती द्रौपदी की मदद करनी ही होगी। यह नई शक्ति, नए उत्साह, हिम्मत और साहस का नवोदय है। किसे पता था कि युवा जनशक्ति का सूर्योदय इस दम-खम के साथ होगा? इस नए सूर्य को सलाम!

 
 
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