एक कठिन वर्ष में प्रवेश करते हुए
एन के सिंह, राज्यसभा सदस्य और पूर्व केंद्रीय सचिव
First Published:03-01-13 07:07 PM
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राष्ट्रीय विकास परिषद ने 12वीं पंचवर्षीय योजना को मंजूरी दे दी है। इस योजना में 2012-2017 की अवधि के लिए देश के आर्थिक विकास की रूपरेखा है। विडंबना यह है कि योजना का पहला साल खत्म हो रहा है। जिस समय योजना को मंजूरी मिली, देश दूसरी समस्याओं में उलझा हुआ था, इसलिए इसे ज्यादा अहमियत नहीं मिल सकी। बल्कि जो पूरा साल अभी-अभी गुजरा है, उसमें खुश होने के लिए ज्यादा कुछ था नहीं। 2-जी घोटाले से भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन शुरू हुआ था, वह कई तरह से अभी जारी है। कोलगेट, विमानों की खरीद, हवाई अड्डों का निजीकरण और तेल व गैस से जुड़े कई घोटालों की श्रृंखला इससे जुड़ गई है। इनमें से ज्यादातर घोटाले किसी स्वतंत्र जांच से उजागर नहीं हुए, बल्कि नियंत्रक व महालेखाकार यानी सीएजी की रिपोर्ट से सामने आए हैं। हालांकि इसमें जो वित्तीय अनुमान बताए गए हैं, उस पर संदेह हो सकता है, लेकिन गड़बड़ियों की बात को सब स्वीकार करते हैं। इन घोटालों से संस्थाओं की विश्वसनीयता गिरी है। संसद में इस या उस कारण से कामकाज नहीं हो पा रहा, एक सत्र तो पूरी तरह बरबाद हो चुका है। इसके लिए विपक्षी दलों को भी बहुत ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि सरकार की तरफ से भी कई खामियां दिखी हैं। विपक्षी दल तो मानते हैं कि ऐसा करके वे जनता की भावनाओं का ही प्रदशर्न कर रहे हैं। जनता का विश्वास कहीं न कहीं सरकार पर से उठा है, उसे लग रहा है कि गड़बड़ियों के चलते संसाधनों में उसकी हिस्सेदारी लूटी जा रही है।

सिविल सोसायटी सरकार के फैसलों पर सवाल उठा रही है और उसे जनता का काफी समर्थन भी मिल रहा है। इसमें भी एक राजनीति हो सकती है, लेकिन राजनीतिक असंतोष तो दिख ही रहा है। दिल्ली में हुई बलात्कार की निर्मम घटना के बाद जनता जिस तरह से सड़कों पर आई, उससे यह जाहिर हो गया कि समाज में असंतोष कितनी गहराई तक पहुंच चुका है। कामकाजी औरतों के लिए सुरक्षित माहौल के न होने, उनकी प्रताड़ना पर सरकार की उदासीनता, ऐसे मामलों की लचर जांच और दोषियों को दंड न दे पाने जैसी चीजों के खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़क गया है। जो कुछ भी हुआ, उससे सही ढंग से सोचने वाले हर नागरिक का सिर शर्म से झुक गया, चीजों को कई तरह से सुधारने की जरूरत महसूस की जाने लगी। निस्संदेह, प्रशासन के सामाजिक पहलू के सामने गंभीर चुनौतियां हैं और ऐसी ही चुनौतियां संविधान के तहत बनी संस्थाओं के सामने भी हैं।

क्या यह बढ़ता असंतोष बड़े सामाजिक बदलाव और नई तरह की जवाबदेही की जरूरत की ओर इशारा कर रहा है? जटिल समाज में प्रशासन की संरचना में केंद्र, राज्य और जिले जैसे कई स्तरों पर तालमेल बिठाना पड़ता है। हम सामाजिक उथल-पुथल की ओर नहीं बढ़ सकते, इसलिए हमें कई बड़े बदलाव करने होंगे, ताकि लोगों का विश्वास हमारी न्यायिक और प्रशासनिक प्रणाली में बना रहे। इसी के साथ अर्थिक मंदी के असर भी अब उजागर हो रहे हैं। इस साल आर्थिक विकास की दर छह फीसदी रहेगी, जिसका असर गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों और रोजगार के अवसर पैदा करने पर पड़ेगा। वित्त मंत्री ने कई कदम उठाने की घोषणा की है, लेकिन विडंबना यह है कि इसमें काफी देरी हो चुकी है और कई ऐसे भी कार्यक्रम हैं, जिन्हें लागू ही नहीं किया गया। उम्मीद है कि नए साल में आर्थिक विकास में स्थिरता आ जाएगी, पर इसके लिए जो कदम उठाए जाने चाहिए थे, वे अभी कहीं दिखाई नहीं दे रहे।

नए साल में उठाए जाने के लायक ऐसे महत्वपूर्ण कदम कौन-कौन से हैं? पहला, 2013 आर्थिक मोर्चे पर हाल-फिलहाल का सबसे कठिन वर्ष साबित होने जा रहा है। सरकार के सामने ऐसे वर्ष में आर्थिक अनुशासन कायम करने की कड़ी चुनौती है, जब सात राज्य विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। साथ ही विकास दर कम होने से राजस्व भी तेजी से गिर रहा है। वित्तीय और चालू खाते के घाटे तेजी से बढ़ रहे हैं। महंगाई और ब्याज दरें अब इतनी ऊंचाई तक पहुंच गई हैं कि अब उनमें सरकार भी बहुत कुछ नहीं कर सकती। विकास की अपनी क्षमताओं का पर्याप्त इस्तेमाल करने के लिए भारत को वित्तीय सुधार करने ही होंगे, जिससे बचत को निवेश में बदला जा सके, ताकि इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास और वित्तीय स्थिरता के लिए धन की जरूरत को पूरा किया जा सके।

दूसरा, आंतरिक सुरक्षा व भ्रष्टाचार का मसला चर्चा में है। भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई और न्याय होते हुए दिखने चाहिए। हमें भ्रष्टाचार विरोधी कड़े कानूनों पर सर्वसम्मति बनाने, तेजी से भेदभाव रहित कार्रवाई करने और समय रहते दंड का प्रावधान जैसी चीजों को प्राथमिकता देनी होगी। देश में न सिर्फ स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच की व्यवस्था होनी चाहिए, बल्कि सजा देने के लिए कई तरह की भूमिकाएं निभाने वाली एजेंसियां भी चाहिए। तीसरा, संसद को भी ज्यादा व्यवस्थित ढंग से काम करना होगा, ताकि लोकपाल, न्यायिक उत्तरदायित्व, सेवा पाने का अधिकार, महिला प्रताड़ना के खिलाफ प्रावधान जैसे जरूरी विधेयक पास हो सकें। यह तभी हो सकेगा, जब सरकार विपक्ष के साथ ठीक ढंग से संवाद कर सके। संसदीय संस्थाएं सिर्फ लिखित नियम-कायदों से ही नहीं चल सकतीं।

चौथा, केंद्र-राज्य संबंधों को भी फिर से देखने की जरूरत है। पिछले साल कई मौकों पर केंद्र और राज्यों के विवाद सामने आए। राज्यों को बहुत मामूली संसाधन दिए जाते हैं और उन पर नीतियां थोपी जाती हैं। इससे आपसी अविश्वास बढ़ा है। कम संसाधनों वाली राज्य सरकारों से ऐसी नीतियां लागू करने के लिए कहा जाता है, जिनमें उनकी अपनी भूमिका बहुत सीमित होती है। यह सहकारी संघवाद के खिलाफ है। केंद्र और राज्यों के बीच अविश्वास को खत्म करना बहुत बड़ी चुनौती है। पांचवा, संस्थाओं की स्वायत्तता और जवाबदेही को कायम करना होगा, ताकि मसलों का तेजी से निपटारा करके अच्छा प्रशासन दिया जा सके। इसके बिना न तो भारत अपने नागरिकों को ठीक से शिक्षित कर सकेगा, न इन्फ्रास्ट्रक्चर ठीक ढंग से बन सकेगा, न कृषि उत्पादकता बढ़ेगी और न आर्थिक विकास के फायदे ठीक से मिल सकेंगे। सार्वजनिक संस्थाएं उम्मीद के मुताबिक सेवाओं को जनता तक नहीं पहुंचा पातीं और इसी से प्रशासन की समस्या पैदा होती है। सेवाओं में गुणवत्ता न होने के कारण जनता का असंतोष बढ़ रहा है। अगर हम 2013 को पिछले साल से बेहतर बनाना चाहते हैं, तो यह सब करना ही होगा। हमें अपने सामने खड़ी इन चुनौतियों से निपटना ही होगा। वह भी तब, जब वक्त बहुत अच्छा नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
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