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फास्ट ट्रैक अदालतें और गति अवरोधक
अवधेश कुमार, स्वतंत्र पत्रकार First Published:03-01-13 07:05 PM

दिल्ली में फास्ट ट्रैक अदालत की शुरुआत हो गई। उम्मीद है कि महिलाओं के उत्पीड़न से संबंधित सभी मामलों की सुनवाई इन न्यायालयों में होगी। इस बीच मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी बलात्कार के मामलों के लिए फास्ट ट्रैक अदालत की घोषणा कर दी, ऐसी ही घोषणा पंजाब, राजस्थान वगैरह में भी हुई है। ऐसा लगता है कि कुछ दिनों के अंदर महिलाओं के उत्पीड़न से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का अस्तित्व देशव्यापी रूप में हमारे सामने होगा। वैसे तो त्वरित न्याय किसी न्याय प्रणाली का स्वाभाविक चरित्र होना चाहिए। ऐसा नहीं है, तभी  ऐसी अदालतों की जरूरत महसूस हो रही है। हालांकि फास्ट ट्रैक न्यायालयों की शुरुआत पहली बार नहीं हो रही। 11वें वित्त आयोग ने लंबे समय से अटके मुकदमों के शीघ्र निपटारे के लिए 1,734 फास्ट ट्रैक न्यायालय बनाए जाने की बात कही थी। वित्त मंत्रलय ने इसके लिए 502..90 करोड़ रुपये की राशि भी निर्गत कर दी। यह राज्यों का दायित्व है कि वे उच्च न्यायालयों से परामर्श कर फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना कराएं व उन्हें सक्रिय करें। फास्ट ट्रैक न्यायालय गठित कराने की एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई और उसके आदेश के अनुसार सरकार ने यह कार्य शुरू किया था। 31 मार्च, 2005 को योजना की समय-सीमा खत्म होने के साथ न्यायालय ने यह फैसला दिया कि इन न्यायालयों को एकाएक बंद नहीं किया जाए।

सरकार ने अगले पांच वर्षों के लिए 1,562 फास्ट ट्रैक न्यायालयों को जारी रखने का अनुमोदन करते हुए 31 मार्च, 2010 तक के लिए 509 करोड़ रुपये की राशि फिर दी गई। बाद में इसे एक साल के लिए और बढ़ाया गया। फिर यह राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया कि वे चाहें, तो अपने खर्च पर इसे जारी रख सकती हैं। दामिनी प्रकरण में पड़े जन दबाव के बाद न्याय के प्रति प्रतिबद्धता जताने वाली केंद्र सरकार यदि वाकई सजग होती, तो इस समय फास्ट ट्रैक अदालतों के निर्माण के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का दरवाजा नहीं खटखटाना पड़ता। फास्ट ट्रैक अदालतें चल रही होतीं और केवल उनमें मामला स्थानांतरित करने का निवेदन करने की आवश्यकता होती। आज भी अगर ढाई करोड़ से ज्यादा मुकदमे हमारे न्यायालयों में लंबित हैं, तो फिर इस योजना को बंद करने का निर्णय सरकार ने क्यों लिया? वैसे फास्ट ट्रैक न्यायालयों का आम अनुभव मिश्रित रहा है। कारण, इसमें ज्यादातर वैसे मामले स्थानांतरित किए गए, जो अजटिल श्रेणी के थे।

वैसे भी फास्ट ट्रैक न्यायालय राज्य सरकारें खुद गठित नहीं कर सकतीं। इसके लिए उच्च न्यायालय से निवेदन करना पड़ता है। मुकदमों की समीक्षा,  उनका वर्गीकरण, फास्ट ट्रैक अदालतों के लिए न्यायाधीशों को चिन्हित करना आदि जटिल प्रक्रियाएं हैं। पर अब इन अदालतों को सामान्य न्याय प्रणाली का अंग बनाने का समय आ गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
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