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करुणा, आवेश और वैराग्य
श्री श्री रविशंकर First Published:03-01-2013 07:03:37 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

जब एक व्यक्ति ध्यान करता है, तो उसे हम तपस्या कहते हैं (केंद्रित प्रयत्न, जो शुद्धि और आत्मिक ज्ञानोदय प्रदान करता है)। लेकिन जब पूरे विश्व के लोग एक साथ जुड़कर ध्यान करते हैं, तो उसे यज्ञ कहा जाता है। यह और भी विशेष होता है, क्योंकि हम सत्व और तालमेल का एक क्षेत्र बना लेते हैं,  जिसकी आज विश्व को अत्यधिक आवश्यकता है। इसकी आवश्यकता क्यों है, यह आप सभी जानते हैं। हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हम नवीन भी हैं और प्राचीन भी हैं। सूर्य को देखिए, यह प्राचीन है, फिर भी आज कितना ताजा है। इसकी किरणें कितनी ताजा होती हैं, इसी तरह ब्रह्मांड के अन्य अवयवों पर गौर कीजिए। वायु ताजा है। पेड़ भी कितने ताजे हैं- पुराने पेड़, पुरानी शाखाएं और ताजे पत्ते! ऐसे ही, आप भी हैं नवीन और ताजे।

ऐसे ही आपको भी जीना चाहिए। इस अनुभव के साथ कि मैं प्राचीन हूं और नवीन भी, शाश्वत और अनंत भी! स्वयं को ताजा और नया अनुभव कीजिए। और आप देखेंगे कि कैसे आपके सम्मुख उपस्थित सारी समस्याएं और खेद सरलता से लुप्त हो जाते हैं। उत्साह कहीं बाहर से हममें नहीं आता, उसका उद्भव हमारे भीतर से होता है और फिर हर स्तर पर वह तालमेल बैठाने लगता है। याद रखिए, जीवन में आपको तीन चीजों की आवश्यकता है- करुणा, आवेश और वैराग्य। जब आप पीड़ा में हैं, व्यथित हैं, तब वैरागी रहिए। जब आप खुश हैं, तब आवेश रखिए। आपके जीवन में कोई धुन होनी ही चाहिए। सेवा करने की धुन तो सबसे अद्भुत चीज है, जिसकी लालसा हर व्यक्ति को होनी चाहिए। इसलिए, जब आप सचमुच खुश हों, तो सेवा करने के लिए हमेशा तत्पर रहिए। और जब कभी दुखी हों, तब वैरागी रहिए व सदैव करुणामयी रहिए।

 
 
 
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