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मैं नहीं हम
नीरज कुमार तिवारी First Published:02-01-13 09:45 PM

उसने तय किया कि इस साल से वह रक्तदान शुरू करेगा। दोस्त थोड़े हैरान हुए, परंतु उसकी सोच के कायल भी हुए। जहां ज्यादातर लोग झूठ नहीं बोलने, वजन कम करने, मांसाहार छोड़ने जैसे संकल्प ले रहे थे, उसने एक ऐसा संकल्प लिया है, जो दूसरों की सेवा पर आधारित था। दरअसल, ऐसे दौर में जब ‘मैं’ शब्द का बोलबाला हो, ‘हम’ के बारे में सोचना थोड़ा आश्चर्य पैदा करता है। लेकिन अक्सर हम जितना चौंकते हैं, यह उतनी चौंकाने वाली बात नहीं होती। आस-पास झांकिए, ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो नए साल के उत्सव के दिन भी किसी ऐसी उलझन में फंसे थे, जो मूल रूप से उनका नहीं था। आंदोलन का केंद्र जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल में शामिल लोग हमेशा मिल जाते हैं। इनके मुद्दे ऐसे होते हैं, जो मैं नहीं, हम का होता है। ‘हम’ के लिए हमारे हाथ कैसे उठे? प्रसिद्ध समाज विज्ञानी ए सोरोकिन ने कहा था कि आदमी की अपनी अंतरात्मा और उसकी आज की दुनिया में नि:स्वार्थ और निर्णयात्मक प्रेम पैदा किया जाए, उसे जमा किया जाए और चलाया जाए, तो बात बन सकती है। सोरोकिन ने दरअसल समाज को सुखमय करने के लिए खुद के समृद्ध होने की बात कही है। यहां समृद्धि का भाव भौतिक चीजों से नहीं, बल्कि उन चीजों से है, जो वस्तुत: आपके पास पहले से मौजूद है। मशहूर चिंतक और ए न्यू अर्थ जैसी किताब के लेखक एक्हार्ट टल्ल कहते हैं कि आप ‘हम’ के बारे में तभी विचार कर सकते हैं, जब यह सोचना बंद कर दें कि आपके पास देने को कुछ भी नहीं है। वह कहते हैं कि समृद्ध होने की शुरुआत का पहला लक्षण है कि आपके पास प्रशंसा, सराहना, प्यार, सहायता जैसी चीजों को बांटने की मन:स्थिति है। लेकिन हम यहां समृद्धि की बात क्यों कर रहे हैं? हम तो नए साल के संकल्प पर विचार कर रहे थे। सच्चाई यह है कि सबसे बड़ा संकल्प है- खुद को समृद्ध करना और निरंतर समृद्धि को बांटना।    

 
 
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