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दुनिया को बदलेगी टेक्नोलॉजी
बिल गेट्स, सह-अध्यक्ष, बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन
First Published:01-01-13 07:12 PM
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आम तौर पर ‘आशावाद’ और ‘यथार्थवाद’ का इस्तेमाल जीवन के दो भिन्न पहलुओं की व्याख्या करने के लिए किया जाता है। मगर मेरा मानना है कि मनुष्य की जीवन स्थितियों में बेहतरी की यथार्थवादी कोशिशें आशावादी विश्वदृष्टि के लिए बाध्य करती हैं। मैं खास तौर पर टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में जो नए-अनूठे प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें लेकर बेहद आशान्वित हूं और यह मानता हूं कि इनसे दुनिया भर के गरीब लोगों की जिंदगी बेहतर होगी। यही कारण है कि मैं वह सब कुछ करता हूं, जो मैं कर सकता हूं। फिर भी, टेक्नोलॉजी और ग्लोबल विकास का एक क्षेत्र ऐसा है, जहां वास्तविकता ने मेरे इस आशावाद को कि सेलफोन विकासशील देशों की जिंदगी में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे, कुछ लचीला बनाया। एक दशक पहले अनेक लोगों का मानना था कि अफ्रीका में मोबाइल डिवाइस का प्रसार डिजिटल एम्पावर्मेट (सशक्तीकरण) की दिशा में अल्पजीवी साबित होगा। ऐसा नहीं हुआ।  दरअसल, डिजिटल एम्पावर्मेट एक लंबी व सतत जारी रहने वाली प्रक्रिया है और सिर्फ सेलुलर टेक्नोलॉजी की मौजूदगी मात्र से यह नहीं हो सकता कि गरीबों की तमाम बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाएं।

लेकिन अब वर्षों के निवेश के बाद डिजिटल एम्पावर्मेट का असर दिखने लगा है। वहां न सिर्फ नेटवर्क कवरेज का दायरा बढ़ने लगा है, बल्कि बेहतर उपकरणों और एप्लिकेशन का भी विस्तार हो रहा है। अब ज्यादा से ज्यादा लोगों की पहुंच में बढ़िया व सस्ती टेक्नोलॉजी आ रही है। कंपनियां नई प्रणाली में निवेश करने को लेकर उत्सुक हैं और उपभोक्ता उस बदलाव का भार वहन करने को तैयार दिख रहे हैं। उदाहरण के तौर पर केन्या के ‘एम-पेसा’ मोबाइल बैंकिंग सेवा को ही लीजिए, जिसने लोगों को अपने मोबाइल के जरिये पैसा भेजने की सुविधा मुहैया कराई है। एम-पेसा को पहले ईंट-लकड़ी से बने अनेक स्टोरों में निवेश करना पड़ा, जहां उपभोक्ता नकदी को डिजिटल राशि में तब्दील कर सकें और फिर उन्हें नकदी में भुना सकें। इस ढांचे की जरूरत तब तक पड़ेगी, जब तक कि अर्थव्यवस्थाएं पूरी तरह से कैशलेस नहीं हो जातीं। जाहिर है, ऐसा होने में कई दशक लगेंगे।

सभी जगहों पर कैश-प्वॉइंट के बिना एम-पेसा की सेवाएं पारंपरिक प्रणाली से अधिक प्रभावी नहीं हो सकतीं। इसी तरह, खुदरा दुकानदारों को भी कैश प्वॉइंट बनने के लिए राजी करना तब तक नामुमकिन था, जब तक कि उन्हें यह यकीन हो जाए कि एम-पेसा के ग्राहक पर्याप्त संख्या हैं और उनके लिए इस सेवा को लेना फायदेमंद है। निजी कंप्यूटर के शुरुआती दिनों में माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन में भी हमें यही रास्ता अपनाना पड़ा था। सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर कंपनियां साथ-साथ काम करने को राजी नहीं थीं। माइक्रोसॉफ्ट ने दोनों को अपनी योजनाएं बताकर भविष्य पर दांव लगाने के लिए राजी किया। सेलफोन के इस्तेमाल से छोटे स्तर के अनेक पायलट प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक काम कर रहे हैं, लेकिन एम-पेसा जैसे बड़े स्तर के प्रोजेक्ट बहुत कम देखने को मिलते हैं। जहां तक डिजिटल क्षमताओं पर आधारित स्वास्थ्य सेवाओं, यानी एम-हेल्थ के क्षेत्र में प्रगति का सवाल है, तो इसकी रफ्तार वाकई धीमी है, क्योंकि इसके लिए एक विशाल तंत्र खड़ा करना और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े तमाम तत्वों को यह समझाना बेहद मुश्किल है कि यह उनके लिए लाभकारी है।

यदि स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कुछ लोग सेलफोन के जरिये एक सेंट्रल डाटाबेस को सूचनाएं भेजते हैं और दूसरे इसका महत्व नहीं समझते, तो डिजिटल प्रणाली अधूरी है। और ऐसे में मौजूदा कागजी व्यवस्था की तरह वह दोषपूर्ण रहेगी। एम-हेल्थ के क्षेत्र में चल रहीं अब तक जितनी भी योजनाएं मैंने देखी हैं, उनमें सबसे अधिक बेहतर और संभावनापूर्ण मुझे घाना में चल रही ‘मोटेक’ लगी। यह सेवा प्रसूति एवं बच्चों की सेहत पर केंद्रित है। सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी फोन लेकर गांव-गांव घूमते हैं और गर्भवती महिलाओं से जुड़ी तमाम गंभीर सूचनाएं डिजिटल फॉर्म में जमा करते हैं। फिर मोटेक उन महिलाओं को साप्ताहिक रिमाइंडर की तरह उनके स्वास्थ्य से जुड़े संदेश भेजते हैं। यह सेवा सरकार को भी ये सारी सूचनाएं उपलब्ध कराती है, ताकि स्वास्थ्य से जुड़ी सही तस्वीर नीति बनाने वाले लोगों के पास हो।

जो एड्स, टीबी, मलेरिया, परिवार नियोजन, कुपोषण और स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य समस्याओं पर काम कर रहे हैं, वे भी इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं, ताकि पूरे देश में स्वास्थ्य से जुड़े सभी तंत्र एक साथ और सही समय पर कदम उठा सकें। यह एक सुखद सपना है, लेकिन यह तभी काम कर सकता है, जब सबसे अगली कतार में खड़े स्वास्थ्य कार्यकर्ता सही डाटा तैयार करें और स्वास्थ्य मंत्रालय उन पर सक्रियता से कदम उठाएं और मरीज अपने फोन पर मिलने वाले संदेश का इस्तेमाल करें। मैंने महसूस किया कि जब मोटेक में शामिल हमारे साङोदारों ने कुछ नेटवर्क लागत और उपभोक्ता के इंटरफेस को सरल करने की बातें शुरू कीं, तो इसकी नकल होने लगी। वास्तव में, उस एप्लीकेशन का उस क्षेत्र में इस्तेमाल हो रहा था। इसका मतलब साफ है कि लोगों के लिए यह सेवा काफी महत्व रखती थी और वे पुरानी व्यवस्था में लौटने की बजाय समस्याओं को दूर किए जाने के पक्षधर थे।
इस डिजिटल पद्धति को अब दुनिया के और क्षेत्रों में विस्तार दिया जा रहा है और इनमें उत्तर भारत के इलाकों को भी शामिल किया जा रहा है।

एक दशक पहले लोगों ने कहा था कि यह पद्धति जल्दी ही छा जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि चीजें अपनी सही जगह पर नहीं थीं। अब वे सही स्थान पर आ रही हैं। कुछ प्रयोगों में एक दशक लग जाएगा, लेकिन रफ्तार अब बढ़ेंगी ही और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, हमें सीखने को भी बहुत कुछ मिलेगा। दीर्घकाल में परिणाम उतना फलदायी तो अवश्य होगा, जैसा हमने सोचा है। आखिरकार, लोग जैसे-जैसे डिजिटल रूप से सशक्त होंगे, वे अपनी तरफ से डिजिटल टेक्नोलॉजी में नए-अनूठे प्रयोग करेंगे और ऐसे उपाय भी सुझाएंगे, जिनके बारे में सॉफ्टवेयर विकसित करने वाले स्थापित लोग कभी नहीं सोच सकते।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
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