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सरल जिंदगी की राह
ब्रह्मकुमार निकुंज First Published:01-01-2013 07:09:59 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

आजकल के नौजवान अक्सर बोलते हैं, ‘टेक इट इजी’ व ‘जस्ट चिल्ल।’ लेकिन क्या जीवन की आपाधापी के बीच ‘टेक इट इजी’ व ‘जस्ट चिल्ल’ वाला रवैया संभव है? नकारात्मक अनुभवों और अशांतिग्रस्त परिस्थितियों के बीच रहकर खुद को हल्का और आसपास के वातावरण को शांत रखना, यह आज के युग में सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए हमें सबसे पहले अपने अंदर छिपी-दबी हुई आत्मिक शक्ति को उजागर करना होगा, क्योंकि यही वह ऊर्जा है, जिससे हम जीवन में आने वाली हर चुनौती का सरलता से मुकाबला कर सकते हैं। कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति का मानसिक संतुलन उसके इर्द-गिर्द रहने वाले लोगों, वस्तुओं और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस पर निर्भर करता है कि वह इन्हें किस नजरिये से देखता है। एक दार्शनिक ने कहा है कि हम परिस्थिति को बदल नहीं सकते, लेकिन उनके प्रति देखने का अपना दृष्टिकोण अवश्य बदल सकते हैं।

मगर देखा गया है कि जब वास्तविक स्थिति हमारे समक्ष आती है, तब हमारे मन में बसे नकारात्मक पूर्वाग्रहों के कारण सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाना हमारे लिए मुश्किल हो जाता है। इसलिए ही यह कहा जाता है कि ‘जैसा सोचें, वैसा बनें। ’हमारे दृष्टिकोण का बीज है, हमारी विश्वास प्रणाली। हमारी विश्वास प्रणाली की सबसे बड़ी खामी है ‘देह अभिमान’, अर्थात स्वयं को अजर-अमर, अविनाशी आत्मा समझने की बजाय विनाशी, हाड़-मांस का शरीर समझना। यह विचार ही आज के मनुष्य के दुख का मूल कारण है। समाज में हो रहे सारे दुष्कर्मों का कारण भी यही देह की दृष्टि है। हमें यह एहसास होना चाहिए की ज्योतिस्वरूप चैतन्य आत्मा का स्वाभाविक गुण हैं- प्रेम, शांति और सुख। अत: जितना हम अपने आत्मिक स्वरूप की स्मृति में रहकर देह को एक साधन समझकर कार्य में लाएंगे, उतना हम इजी और निश्चिंत रहेंगे। साथ ही दूसरों को भी इजी और निश्चिंत रख पाएंगे।

 
 
 
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