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इस नई सुबह से एक उम्मीद
हरजिंदर, सीनियर एसोशिएट एडीटर, हिन्दुस्तान
First Published:31-12-12 07:27 PM
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दिल और दिमाग पर जिस तरह के बोझ लिए हम 2013 में पहुंचे हैं उसमें न नए साल का जश्न मनाने का कोई उत्साह है और न ही पुराने साल से लगाव दिखाने की कोई वजह। लेकिन नए साल की सर्द सुबह से उम्मीदें बांधने की रवायत पुरानी है। हर बार हम यही सोच कर नया वर्ष शुरू करते हैं कि पिछले साल जो दुख और तकलीफें हमारी छाती पर मूंग दलते रहे वे इस साल अपना मुंह नहीं दिखाएंगे। और वे सारे सपने जो पिछले साल न जाने कि कोल्ड स्टोरेज में आराम फरमा रहे थे इस साल तो साकार होंगे ही। इस बार, इस साल की पहली सुबह निराशाओं का कोहरा कुछ ज्यादा ही गहरा है इसलिए ऐसी कामनाएं ही हमारा सबसे बड़ा सहारा हैं। हमें उसी मोड़ से ही आगे बढ़ना है जहां पिछले साल ने हमें लाकर खड़ा कर दिया है।

पिछले साल की सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वह अपने लिए जीने वाला साल था ही नहीं। अर्थव्यवस्था और राजनीति के बहुत से मोर्चों पर या तो वह अपने पहले के वर्षों के सदमों से उबरने में लगा रहा, या कुछ ऐसी चीजें की गईं जिनके नतीजे की उम्मीद उस साल नहीं थी। राजनीति में तो बाकायदा 2014 की चरण-वंदना कुछ इस तरह से शुरू हो गई जैसे 2012 और 2013 सिर्फ समय बिताने के लिए ही हैं। यहां तक कि दिसंबर में जब नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार गुजरात विधानसभा का चुनाव जीत कर इतिहास रचा तो चुनाव नतीजों पर जश्न मनाने वालों और गश खाने वालों, दोनों की नजरें इस इतिहास के बजाए दो साल बाद के भविष्य पर ही टिकीं थीं। उस साल पर जिसकी राह में खुदरा कारोबार के लिए एफडीआई और नगद सबसिडी जैसे पलक पांवड़े बिछाए जा रहे हैं। वर्ना 2012 के पास अपने लिए जो था उसे पॉलिसी पैरालिसिस यानी लकवाग्रस्त नीतियों की ही संज्ञा दी गई थी। इस सबका अर्थ सिर्फ इतना है कि हमारी सारी राजनैतिक व्यवस्था के लिए 2013 सिर्फ 2014 तक पहुंचने के रास्ते की एक सीढ़ी भर ही बना रहेगा।

ऐसे साल से उम्मीदें बांधना और भी मुश्किल काम है। ऐसा नहीं है कि 2012 की यात्रा हमने उम्मीदों से नहीं शुरू की थी। सच तो यह है कि उस सुबह जितनी उम्मीदें दिख रहीं थीं उतनी पिछले कईं साल में कभी नहीं दिखीं। लोकपाल विधेयक लोकसभा में पहले ही पास हो चुका था और लगने लगा था कि सब कुछ भले ही न बदले लेकिन चीजें अब पहले जैसी नहीं रहेंगी। पिछली पूरी सर्दियां कथित सिविल सोसायटी के आंदोलन की गुनगुनी ऊर्जा हर कोई महसूस कर रहा था। यहां तक कि सत्ता में बैठे लोग भी डरे हुए थे कि कहीं यह ऊर्जा बढ़कर उनकी शासन शैली को ही न झुलसा दे। लेकिन आंदोलन के नेता जिस तरह आपस में उलझे, सड़कों पर निकले लोग एक बार फिर उदासीनता को चादर तान सो गए। लेकिन जल्द ही यह नींद भी टूटी, खासतौर पर शहरी नौजवानों की। दिल्ली में एक अनाम लड़की के साथ बलात्कार की निमर्म वारदात हुई तो इन नौजवानों को फिर एक बार लगा कि यह उदासीन रहने का वक्त नहीं है। इस बार जब नौजवान इंडिया गेट पर जमा हुए तो उनका कोई नेता नहीं था। और कुछ असामाजिक राजनैतिक तत्वों की हकरतों को छोड़ दें तो मोमबत्तियां जलाकर विरोध जताने वाले ये नौजवान काफी हद तक अनुशासति भी थे।

पिछले दो साल में हमें जो दिखा है इस हुजूम ने उसका अर्थ भी हमें समझा दिया। दरअसल भारत के शहरी मध्यवर्ग का नौजवान अपनी प्रतिभा और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने के रास्ते और बाधाओं को हटाने के तरीके खोज रहा है। अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और रामदेव अपने आप में कुछ नहीं मध्यवर्ग की इसी खोज का नतीजा भर थे। ये नेता जब कुछ अलग हितों की ओर बढ़ते दिखे तो मध्यवर्ग ने उनका साथ छोड़ दिया। फिर जब एक और मौका आया तो यह हुजूम बिना किसी नेता के ही सड़क पर आ गया। सड़कों पर आए ये नौजवान ही दरअसल 2013 की सबसे बड़ी उम्मीद हैं। संभावनाओं की अंधेरी कोठरी में यही अकेला रोशनदान है। हालांकि सभी इसे उम्मीद नहीं मानते। कुछ लोग इन्हें ‘वीकेंड क्रांतिकारी’ भी कह रहे हैं। अंग्रेजी लेखिका अरुंधति राय का कहना है कि बलात्कार की वारदात जब दिल्ली में होती है तो इतना बवाल खड़ा किया जाता है, आदिवासी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत में ऐसी वारदात पर किसी के कानों पर जूं भी नहीं रेंगती। अरुंधति जो कह रही हैं उसमें एक सच्चई भी है। शहरी मध्यवर्ग की सोच और सक्रियता की अपनी सीमाएं हैं।

हालांकि यह भी सच है कि यही मध्यवर्ग ही कईं बार अपनी सीमाओं बाहर निकला है। खुद अरुंधति भी इसी वर्ग की हैं। ऐसी ही एक दूसरी आलोचना इसे सवर्णों और मध्यम जातियों का आंदोलन भी बता रही है। इस आलोचना को भी पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन इन आलोचनाओं से इस आंदोलन का महत्व कम नहीं हो जाता। ये उस वर्ग के लोग हैं जिनके बारे में हम न जाने कब से यह मान बैठे थे कि ये सुविधाभोगी लोग कभी सड़क पर नहीं आएंगे। नगरों, महानगरों की तमाम परेशानियों और महंगाई की मार वगैरह से परेशान होने के बावजूद वे कभी उठ खड़े नहीं होंगे। और तो और हमारी सरकारें, हमारा प्रशासन और हमारा राजनैतिक वर्ग इसे लेकर आश्वस्त सा था। लेकिन अब जब इन लोगों के धैर्य का बांध टूट रहा है तो यकीन मानिए कि बहुत सारी चीजें अब पहले जैसी नहीं रहेंगी।

राजनीति की चाल हो सकता है अभी भी थोड़ी अलग रहे लेकिन सरकार और प्रशासन पर जैसा दबाव यह शहरी मध्यवर्ग के लोग बना सकते हैं, वैसा शायद फिलहाल कोई और नहीं बना सकता। चीजें अगर बदलेंगी तो उनका असर नीचे तक भी पहुंचेगा ही। पर यह सोचना अभी शायद बेमानी होगी कि यह असर दलितों, जन-जातियों और पिछड़े इलाकों तक भी पहुंचेगा। अंत में तो उन्हें भी अपने अधिकारों के लिए खुद ही खड़े होना पड़ेगा। वैसे भी जो नौजवान हर रोज जंतर-मंतर पर पहुंच रहे हैं वे किसी बुनियादी बदलाव, किसी सामाजिक क्रांति, किसी संपूर्ण परिवर्तन की बात नहीं कर रहे। वे एक अच्छा प्रशासन और जवाबदेही वगैरह की बात कर रहे हैं। सिर्फ इतने भर के लिए वे सरकार और राजनीति के यथास्थितिवाद से टकरा रहे हैं। हो सकता है कि इससे जो संभावनाएं बने वे बहुत छोटी सी ही हों। लेकिन फिलहाल हमारे पास इससे बड़ी कोई उम्मीद भी तो नहीं है।

 

 
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