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जन आंदोलन का जीवित रूप थे राजनारायण
शतरुद्र प्रकाश, समाजवादी नेता First Published:30-12-12 07:56 PM

दिल्ली की ठिठुरती ठंड में नौजवान जिस तरह इंडिया गेट पर जुटे व राष्ट्रपति भवन में जाने की कोशिश की, उससे 40 बरस पुराना एक वाकया याद आ गया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जनतंत्रीकरण व शिक्षा में आमूल परिवर्तन की अपनी मांग राष्ट्रपति को बताने के लिए हम कुछ छात्रों ने तीन नवंबर 1971 को राष्ट्रपति भवन में प्रवेश किया। हम नारा लगाते हुए अंदर घुसे। सुरक्षाकर्मियों ने बंदूकें तान ली थीं, पर जान की किसको परवाह थी! गिरफ्तार करके हम लोगों को तिहाड़ जेल भेजा गया। राजनारायण तब राज्यसभा सदस्य थे। उनके हस्तक्षेप से हम लोगों को रिहा किया गया। रिहाई के बाद राष्ट्रपति के बुलावे पर राजनारायण के साथ हमने उन्हें अपनी बात बताई। अन्य बातों के अतिरिक्त राष्ट्रपति ने हमसे कहा, मैं तो मेहमान हूं, राष्ट्रपति तो आते-जाते रहेंगे, राष्ट्रपति भवन देश और जनता की अमानत है। 

ऐसे मौकों पर राजनारायण हमेशा याद आते हैं। बगैर सत्याग्रह व संघर्ष के वह लोकतंत्र को बेजान मानते थे। अपने पथ के अकेले पथिक थे- एक पैर जेल में, दूसरा पैर रेल में। जेल के बाहर रहने पर एक ही स्थान पर दो दिन ठहरना उनके लिए मुश्किल था। वह रमता जोगी-बहता पानी थे। वह काशी के थे। भारतीय राजनीति के कबीर थे। कबीर भी काशी के थे। जो घर जारे आपना चलै हमारे साथ..।  

राम मनोहर लोहिया उनके आदर्श व प्रेरणा, दोनों थे। उनके समाजवादी विचारों को साकार करने में वह जीवनर्पयंत लगे रहे। उनके व्यक्तित्व में हनुमान का बल था। लोहिया के जीवित रहते उन्होंने कई ऐतिहासिक सत्याग्रह व आंदोलन किए। 1956 में काशी विश्वनाथ मंदिर में हरिजन प्रवेश आंदोलन, अंग्रेजी हुकूमत की महारानी विक्टोरिया की काशी में लगी मूर्ति का भंजन आंदोलन, गरीबों को रोटी दिलाने के लिए विधानसभा में सत्याग्रह, जो जमीन को जोते-बोए, उसको जमीन का मालिक बनाने के लिए सत्याग्रह, आदि। लोहिया की मृत्यु के बाद भी उन्होंने कई आंदोलन किए।

1971 में वह रायबरेली से लोकसभा का चुनाव इंदिरा गांधी से हार गए। उन्होंने चुनाव को रद्द करने के लिए इलाहाबाद हाइकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की, तो सब लोग उन पर हंसे। लेकिन जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा का फैसला आया, तो एक नया इतिहास बन गया। चुनाव रद्द हो गया। उस फैसले के बाद जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में ऐसा जबर्दस्त उबाल आया कि देश में भूचाल आ गया था। देश में आपातकाल लगाना पड़ा और इसके बाद राजनारायण ने उसी रायबरेली से इंदिरा गांधी को चुनाव हराकर एक इतिहास रचा। वह आजीवन व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षरत रहे। मनमाफिक व्यवस्था बनाने के लिए खुद की बनाई व्यवस्था को तोड़ने में उन्हें कोई मोह न हुआ। दिल्ली के जंतर-मंतर पर जमा हो रहे नौजवानों को इसी जज्बे की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
 
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