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रजाई में दुबककर परिवर्तन का चिंतन
गोपाल चतुर्वेदी First Published:30-12-2012 07:55:53 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

हम उस ट्रकवाले के मुरीद हैं, जिसने ‘बुरी नजरवाले, तेरा मुंह काला’ जैसी इबारत ईजाद की। वह वाकई भविष्यवक्ता रहा होगा। इधर बुरी नजर वालों की तादाद में बेतहाशा वृद्धि हुई है। शुरुआती बुरी नजर अर्थव्यवस्था को लगी। जब यूरोप-अमेरिका पिछड़ रहे थे, हमने तरक्की की। कई बुरी नीयत वालों ने डाह भरी नजर डाली, तो भट्ठा बैठ गया देश के आर्थिक तंत्र का। कुछ कहते हैं कि जर्जर सरकारी खजाने में भ्रष्टाचार का छिद्रित पेंदा है। ऊपर से टैक्स के अरबों रुपये आते हैं और नीचे पहुंचते-पहुंचते गायब हो जाते हैं। अपना मानना है, यह बुरी नजर का असर है।

इन बुरी नजर वालों ने धन के बाद मन को भी नहीं बख्शा है। नहीं, तो रेप, अपहरण, हत्या जैसे गुनाह इस नैतिक देश में कैसे होते? जो संस्कारों का सूरज है, उसके आसपास बुरी नजर का ऐसा गहरा घेरा है कि लोग अमर्यादित भटक रहे हैं। कतई सांड़ की तरह। कहीं सींग, कहीं मुंह मारते हुए। आंकड़े गवाह हैं कि हिन्दुस्तान में ऐसे नर-पिशाचों की इफरात है।

हमें विश्वास है कि यह झाड़-फूंक की अंधविश्वासी नजर नहीं है। इसकी जड़ों में सत्ता का अहंकार, ताकत की बर्बरता, सामंती सोच व भ्रष्टाचार अर्जित दौलत, नियम-कानून से परे होने की मानसिकता जैसे तत्व हैं। क्या किसी नेता ने कुरसी से अवैध कमाई करने की सजा पाई है? कानून की देवी अंधी है। करोड़ों के बंगले व हीरे- आभूषण कैसे देखें? सजा साक्ष्य मांगती है। कोठी-बंगले बेनामी हैं व दौलत दान-चंदे की!

रजाई में दुबककर चाय सुड़कते हुए हमें ऐसे देशद्रोहियों के इंकलाबी खयाल अक्सर आते रहते हैं। हमें लगता है कि हमने क्रांति की खाली-पीली चिंता से अपनी हिस्सेदारी पूरी कर दी है। क्रांति लाने का काम अब दूसरों का है, वे भी हाथ-पैर हिलाएं। अपना कर्तव्य निभाएं। रजाई त्यागने और खिड़की तक जाने का कष्ट हम क्यों उठाएं? कोहरे को चीरकर अगर नए वर्ष की भोर की किरणों को आना है, तो वे खुद-ब-खुद पधारें। कौन जाने, बुरी नजर के साये भी बैठे-ठाले दूर हों। इसके लिए भी हाथ-पैर की मशक्कत अपने वश की नहीं है। हमने रास्ता दिखा दिया है, क्या इतना काफी नहीं है?

 
 
 
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