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मौत की सजा नहीं है बलात्कार का हल
खुशवंत सिंह, वरिष्ठ लेखक और पत्रकार
First Published:28-12-12 07:33 PM
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अपने देश में बलात्कार के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। फिलहाल अपना मीडिया उस पर ज्यादा से ज्यादा तवज्जो दे रहा है। यह अच्छी बात है। आज औरतें अपने-अपने खोलों से निकल कर बाहर आ रही हैं। वे दफ्तरों, दुकानों और फैक्टरियों में आदमियों के साथ काम करने लगी हैं। ऐसे में बलात्कार के मामले बढ़ेंगे ही जब तक हम अपने कानून में जबर्दस्त बदलाव नहीं करते। इधर यह मांग बढ़ रही है कि बलात्कारी को मौत की सजा दे दो। लेकिन यह कोई हल नहीं है। सजा तो रोकने के लिए होती है। उसे पब्लिक गुस्से का हथियार नहीं बनाना चाहिए। आखिरकार हत्यारों को मिलने वाली मौत की सजा से हत्याओं में कोई कमी नहीं आई है। मेरे खयाल से तो उसकी सबसे बड़ी सजा मुजरिम को इस काम के लायक ही नहीं छोड़ना है। ताकि वह चाह कर भी इस काम को अंजाम न दे सके। इस सजा को हर हाल में जरूरी बना देना चाहिए। उसे जज के मर्जी पर नहीं छोड़ना चाहिए। मुझे यह भी महसूस होता है कि वेश्यावृत्ति को कानूनी जामा पहना दिया जाए। ताकि जो आदमी अपनी हवस मिटाना चाहते हैं, उसे सही जगह मिटा सकें। वे अपने को जबर्दस्ती किसी पर न थोपें। यह गौरतलब है कि जिन अमीर देशों में यह किया गया है, वहां इस तरह के मामलों में खासा कमी आई है। वहां औरतें ज्यादा आजाद हुई हैं और बलात्कार कम हो गए हैं। एक और बात है। वहां पर तो अब वेश्यावृत्ति भी कम होने लगी है। शायद प्रोफेशनल ने शौकिया लोगों को खदेड़ दिया है।

अर्श मल्शियानी
यह इत्तेफाक ही था। एक दिन अचानक मुझे बालमुकुंद यानी अर्श मल्शियानी की नज्म हकीकत देखने में आई। मैंने उसका कामना प्रसाद के साथ अनुवाद किया था। उसे पेंगुइन से आई अपनी किताब सेलिब्रेटिंग द बेस्ट ऑफ उर्दू पोएट्री।  में शामिल किया था। वह मेरे मौजूदा हालात को बयां करती है।
फिरदौस के चश्मों की रवानी पे ना जा।
ऐ शेख तू जन्नत की कहानी पे ना जा।।
इस वहम को छोड़, अपने बुढ़ापे ही को देख।
हूरान ए बहिश्ती की जवानी पे ना जा।।

बेटे की मेहरबानी
अपने पिता को वियाग्रा की ओर देखते हुए उसके बेटे ने कहा, ‘पापा, यह बेहतरीन सेक्स टॉनिक है। आप भी एक ट्राई कर सकते हैं। पर इसकी कीमत दस डॉलर है। आप इसका भरपूर इस्तेमाल कर लेना।’ अगली सुबह पिता ने 110 डॉलर ब्रेकफास्ट की टेबल पर छोड़ दिए। साथ में एक पर्ची थी। लिखा था, ‘शुक्रिया बेटे। दस डॉलर मेरी ओर से और 100 डॉलर अपनी मां की तरफ से।’

बेचारा प्रेमी
एक औरत मर गई। उसका एक जवान प्रेमी था। यह बात सब जानते थे। उसका पति भी। शोकसभा में प्रेमी का बुरा हाल था। पति अलग परेशान था। वह जवान प्रेमी के पास गया और बोला, ‘क्यों रो रहे हो? मैं जल्द ही शादी करने जा रहा हूं।’
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
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टिप्पणियाँ
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टिप्पणियॉ पढ़े(4)
मेरी समझ में अपराधी को सजा और नारी के प्रति न्याय , दो अलग-अलग बातें तक अपराधी को सजा देने की बात है, कानून को और कड़ा बनाने की जरूरत है तथा उससे भी ज्यादा उसके सही और ईमानदारी पूर्वक क्रियान्यवन जहाँ तक नारी के न्याय की बात है, उसके लिये हमको,आपको, सभी को अपनी मानसिकता में बदलाव की जरूरत क्यूकि सभी एक जैसे नहीं
By Pradeep Madhdeshiya (30th-December-2012 12:08:AM)
MAI KHUSWANT JI KI BAAT SE SAHMAT HOON KI KAVAL MAUT IS SMASYA KA SMADHAN NAHI HAI,JAB TAK LOGO K MAN ME SAJA KA DAR NAHI BAITHEGA,JAB TAK AAM ADMI POLIC K PAS JANE SE NAHI DAREGA, JAB TAK HAMARI SARKAR OR POLICE HAMARI PARESANIA NAHI SUNEGI,JAB TAK AISE DARINDO KO SARE AAM TADPA-TADPA KAR NAHI SAJA DI JAB TAK HAMARE COURTS ME CAESO KA NIPTARA JALDI NAHI TAK AISI SAMASYAYE JAHAN TAHAN SAR UTHAKAR HAMARE SAMNE KHADI HOTI KA DAR LOGO ME TABHI HOGA JAB IN HAIWANO KO SARE AAM BAIJJAT KARKE SAJA NAHI DI JATI
By NEERAJ GUPTA (29th-December-2012 08:04:PM)
खुशवंत सिंह JI, JIS DIN AAPKE SAATH HOGA NA US DIN DEKHNA KI YE VICHAR TAB AAP KO YAAD BHI HOGEY YA NAHI
By pramod  (29th-December-2012 05:27:PM)
IN DARENDO KO FASI KI SAJA NAHI HONA KI LADKI JITNE DIN TADPI HAI KAM SE KAM UTNE DIN YE SABHI DARINDE LOGO KA SIRF ASALAHA AUR DONO SARE AAM JABT KARLENA YEHI KANOON BANE JO PAKADA JAI USKA [ASALAHA AUR DONO GOLI ]JABT HONE KA KANOON BANE TBHI JAKAR YE SARI GHINAUNI WARDAT KHATAM ANG SE WARDAT HUI HAI KA JABT HINA UN DARINDO KO SAJA MILNI CHHIYE [ASALAHA AUR DONO GOLI JABT HONE KANOON]TAB SAMAJH ME AYEGA KI DARD KAISA HOTA
By AJAI (29th-December-2012 02:28:PM)
 
 

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