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राधे मां के खिलाफ केस दर्ज।
नए भारत के इस बीज को सींचने की जरूरत
वृंदा करात, सांसद और सदस्य माकपा पोलित ब्यूरो First Published:27-12-2012 07:11:20 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

यदि दिल्ली पुलिस और सरकार ने अपने बुनियादी कर्तव्य सही तरीके से निभाए होते, तो सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ हॉस्पिटल में पल-पल जिंदगी की दर्दनाक जंग लड़ रही छात्र आज अपनों के बीच सुरक्षित हंस-बोल रही होती। उदाहरण के तौर पर, यदि पूर्व में लिए गए फैसले के मुताबिक, काले शीशे वाली बसों के मालिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई होती, तो इतना वीभत्स कांड न हो पाता। लेकिन फिर भी दिल्ली के शीर्ष पुलिस अधिकारी, जिन्हें गाइडलाइन्स पालन न करने के लिए सजा मिलनी चाहिए, अपनी तारीफ में खुद ही कसीदे गढ़े जा रहे थे और गृह मंत्री उनके बचाव में उतर आए। बल्कि सुशील कुमार शिंदे ने तो युवा प्रदर्शनकारियों की ही तुलना माओवादियों से कर डाली।

इस मर्मातक घटना के बाद देश और राजधानी दिल्ली में लोगों का गुस्सा फूटना लाजिमी था। दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों का आलम यह है कि सिर्फ एक साल में 600 बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से आधे से अधिक तो छोटी बच्चियों के साथ यह क्रूरता हुई। हर दिन हजारों औरतों को सड़कों पर, बसों व मेट्रो में तरह-तरह की यौन प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ता है। कामकाजी महिलाएं खास तौर पर निशाने पर होती हैं। लेकिन महिला संगठनों की लगातार कोशिशों के बावजूद इस मामले में सरकार व प्रशासन की तरफ से षड्यंत्रपूर्वक खामोशी ओढ़ी जाती रही। दिल्ली में आज जो नारे सुनाई पड़ रहे हैं, वे इस बात के संकेत हैं कि अब चुप्पी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और इसीलिए हम इस आंदोलन का दिल से स्वागत करते हैं।

दिल्ली की सड़कों पर हजारों नौजवान लड़के आज पीड़ित लड़की के लिए इंसाफ की मांग कर रहे हैं। मुमकिन है कि इस आंदोलन से युवकों में संवेदनशीलता आए और वे महिलाओं को उपभोग की वस्तु की बजाय उन्हें बराबरी की नजर से देखें, यदि महिला साथी के साथ कुछ गलत होता हुआ उन्हें दिखे, तो वे खुलकर उसका साथ दें, अपने घरों में भी अपनी बहनों के साथ होने वाले किसी तरह के भेदभाव को खत्म कराएं व दहेज की मांग न करें। आखिर महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और यौन अपराधों के लिए पुरुष ही दोषी हैं। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात है पुरुषों, खासकर नौजवानों के नजरिये का बदलना और उम्मीद है कि यह आंदोलन इस लिहाज से असरदार छाप छोड़ेगा।

इस आंदोलन की सबसे अहम और गौर करने लायक बात यह है कि इसमें हजारों की संख्या में युवतियों ने खुद-ब-खुद भाग लिया है। पीड़िता जिस दर्द से गुजर रही है, उसकी टीस आज तमाम युवतियों के चेहरे पर है। दरअसल, सार्वजनिक जगहों पर मिले निजी अनुभवों की पीड़ा ने इन्हें एक सूत्र में बांधा है। यही नहीं, इस आंदोलन में भागीदारी से उन्हें जरूर यह साहस मिला है कि वे अब अपने घरों में भी खुद के साथ होने वाले किसी भेदभाव पर सवाल पूछेंगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

 
 
 
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