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जनता की आवाज ही उम्मीद है
अरुणा रॉय, प्रसिद्ध समाज सेविका
First Published:26-12-12 09:31 PM
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गुजरते साल ने जन आंदोलनों के लिए जहां कुछ संभावनाएं तैयार की हैं, वहीं कई सवाल भी छोड़े हैं। सुदूर दक्षिण के तटीय इलाकों में परमाणु ऊर्जा संयत्र का विरोध कर रहे लोगों का कुडनकुलम आंदोलन जहां आशा जगाता है, वहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे आंदोलन की परिणति निराशा का माहौल बनाती है और जन-आंदोलनों की प्रासंगिकता को चुनौती देती दिखती है। जो शासन व्यवस्था भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की वजह से 2011 में फंसी हुई थी, वह 2012 में उससे मुक्त हो गई है।

लोकपाल बनाने का उसका वायदा कोरा साबित हुआ। लोकपाल के अलावा शिकायत निवारण कानून, न्यायिक जवाबदेही अधिनियम, व्हिसल ब्लोअर्स बिल व स्वतंत्र लोकायुक्तों की नियुक्ति जैसे तमाम महत्वपूर्ण कानून संसद में अटक गए। आंदोलनों का दबाव शिथिल होते ही सरकार ने राहत की सांस ली। उसे लगा कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने खुद को एक राजनीतिक समूह में परिवर्तित करके न केवल अपनी धार गवां दी है, बल्कि अपनी साख भी खो दी है।

यह भी लगा कि सरकार अपने सोशल एजेंडे से पूरी तरह हट गई है और उसने सामाजिक एजेंडे की जगह एक तकनीकी एजेंडा अपना लिया है। उसे लगता है कि तकनीक हर समस्या का रामबाण हल है। फूड सिक्योरिटी बिल की मांग लंबे समय से की जा रही है, मगर लगता है कि अब सार्वजनिक वितरण प्रणाली को ही पूरी तरह से ध्वस्त किया जा रहा है। ‘आपका पैसा-आपके हाथ’ के लुभावने नारे के साथ नकदी हस्तांतरण इस दिशा में उठा खास कदम माना जा सकता है।

आज कैश ट्रांसफर को बहुत सारी समस्याओं का एकमात्र हल बताया जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि इससे भ्रष्टाचार का खात्मा हो जाएगा। सब्सिडी का दुरुपयोग रुकेगा और पैसा सीधे लाभार्थियों के खातों में पहुंच जाएगा। लेकिन अनुभव यह बताते हैं कि कैश ट्रांसफर के जरिये कोई नया लाभ जनता को नहीं दिया जा रहा है, बल्कि जो लाभ पहले से ही दिए जा रहे हैं, उन्हीं को बैंक खातों के जरिये देने की घोषणा की गई है।

अधिकांश जनता की बैंकों तक पहुंच नहीं होना भी इस प्रयोग की सफलता के प्रति संदेह पैदा करता है। सरकारी योजनाओं से मिलने वाले लाभ के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य किए जाने की भी जन आंदोलनों ने जमकर आलोचना की है। इस वर्ष जन आंदोलन के साथियों ने रोजी-रोटी के अधिकार के संघर्ष को और अधिक सघन तथा मजबूत किया है। बाबा आढ़व की अगुवाई में पेंशन परिषद ने वृद्धों के लिए प्रतिमाह 2000 रुपये की पेंशन की मांग की। जिसे सरकार ने सैद्धांतिक रूप से तो माना है, मगर अभी वह इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं कर पाई है।

इस साल बुजुर्गों का पेंशन आंदोलन देश भर में फैला। पुणे से लेकर जयपुर तक हजारों की तादाद में बुजुर्ग एकत्र होकर सामने आए। दिल्ली में पेंशन परिषद को 50 सांसदों सहित ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने आकर संबोधित किया, वहीं जयपुर में पेंशन परिषद के धरने पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहुंचे। इस बात पर पूरा जोर दिया गया कि बिना एपीएल/बीपीएल और जाति व समुदाय का भेद किए सभी बुजुर्गों को पेंशन दी जाए। सरकार को अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की तरफ लौटाना इस साल की सबसे बड़ी चुनौती थी।

जंतर-मंतर पर चली जन संसद ने जन आंदोलनों को एकजुट करने का काम किया और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की विफलता से उपजी निराशा को कम करने की कोशिश की। यह विभिन्न जन आंदोलनों का साझा मंच था। जन संसद भारतीय संविधान को स्वीकारने की 63वीं वर्षगांठ पर आयोजित की गई थी, इसने लोकतंत्र के अधूरे रह गए लक्ष्यों को फिर से परिभाषित करते हुए उनकी प्राप्ति का संकल्प लिया। पांच दिनों तक चली इस जन संसद ने देश भर के जनपक्षीय मुद्दों को छुआ। वह चाहे मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी की बात हो अथवा सामाजिक सुरक्षा की बात हो। सबको राशन-सबको पेंशन देने की मांग उठी।

वहीं आधार कार्ड की अनुपयोगिता और उसके जरिये नागरिकों की निजता में सरकार के हस्तक्षेप की भी आलोचना की गई। साथ ही देश भर में विरोध की आवाजों को दबाने के राज्य के अलोकतांत्रिक रवैये की भी जमकर आलोचना की गई। यह वर्ष आंदोलनकारियों को गिरफ्तार करने तथा उन्हें जेल की सलाखों के पीछे धकेलने के सरकारी कुप्रयासों का साल भी रहा। कुडनकुलम के हजारों नागरिकों पर देशद्रोह का आरोप लगाकर उनके दमन की कोशिश की गई, उन्हें राष्ट्र विरोधी घोषित किया गया।

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किया गया और फेसबुक पर महज टिप्पणी करने पर ही मुंबई की दो लड़कियों को गिरफ्तार किया गया। बड़वानी जिले में दलित आदिवासियों की आवाज को मुखरता से उठाने वाली माधुरी कृष्णमूर्ति को जिलाबदर कर दिया गया। राजस्थान के खनन माफिया के खिलाफ संघर्ष कर रहे कार्यकर्ता कैलाश मीणा व उनके साथियों पर दर्जनों झूठे मुकदमे ठोके गए।

जन अधिकारों के लिए संघर्षरत मेधा पाटकर को भी गिरफ्तार किया गया। कोलकाता के वैज्ञानिक हो या बिहार सरकार के कर्मचारी, उनकी अभिव्यक्ति पर पहरे लगाने में विभिन्न सरकारें पीछे नहीं रहीं। झारखंड की प्रसिद्ध आदिवासी पत्रकार दयामणि बारला को आदिवासियों की आवाज उठाने के जुर्म में काफी समय तक जेल में रहना पड़ा। मध्य प्रदेश में सुनीलम व उनके साथी आजन्म कारावास भुगत रहे हैं। मगर इन सबसे आंदोलनकारियों के हौसले टूटे नहीं हैं।

दिल्ली में पैरा मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म के खिलाफ जिस तरह का स्वत:स्फूर्त जन-ज्वार आज उठ खड़ा हुआ है, जनाक्रोश की इस अभिव्यक्ति ने फिर से यह साबित किया है कि देश की जनता की आत्मा अभी मरी नहीं है, उसमें दृढ़ संकल्प है, देश को सही दिशा में ले जाने, स्थितियों और व्यवस्था को बदलने का। दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ जिस तरह से इन दिनों पूरा देश एकजुट है और आक्रोश को अभिव्यक्ति दे रहा है, इससे लगता है कि देश में आंदोलनों का भविष्य उज्जवल है।

लगता है कि यह गुस्सा बलात्कार पीड़िता को न्याय दिलाकर दम लेगा, बल्कि दुष्कर्म जैसा जघन्य अपराध करने वालों के खिलाफ एक मजबूत कानून भी पारित कराने में सफलता हासिल करेगा। यह उम्मीद की जा सकती है कि जन आंदोलन वर्ष 2013 में जनता के मुद्दों को और अधिक मजबूती देंगे और व्यवस्था परिवर्तन के तमाम सारे आंदोलन अधिक सघन व प्रभावी होंगे।
साथ में भंवर मेघवंशी
(ये लेखकद्वय के अपने विचार हैं)

 
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