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अधूरे सुधारों से यह आक्रोश न थमेगा
पवन वर्मा, लेखक और राजनयिक First Published:24-12-12 07:16 PM

इन दिनों दिल्ली की सड़कों पर जो आक्रोश दिख रहा है, वह मध्य वर्ग की युवा पीढ़ी का है। राजधानी में एक लड़की से बलात्कार की निर्मम घटना ने इस चिनगारी को भड़काया है। लेकिन इस घटना ने युवा वर्ग के आक्रोश को बस हवा दी है। बाकी जो बीते तीन—चार दिनों से दिख रहा है, वह व्यवस्था से उपजे जन आक्रोश की सामान्य अभिव्यक्ति है। इस नाराजगी के पांच कारण हैं। पहला, प्रशासनिक अव्यवस्था या व्यवस्था में सुस्ती। सामूहिक बलात्कार की घटना ने इस सच को एक बार फिर उजागर किया है। दूसरा, भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना। वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था में पांच फीसदी की दर से विकास हो रहा है। नौकरियां घट रही हैं और कईं तरह के खतरे मंडरा रहे हैं। एक आकलन के मुताबिक, लगभग 20 फीसदी नौकरियां घटी हैं। आर्थिक विशेषक यह मान रहे हैं कि यह तो शुरुआत है, आगे स्थिति इससे भी बदतर हो सकती है। तीसरा, इस वर्ग की नजर में राजनीति अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है। क्योंकि वह तमाम परेशानियों और खामियों के लिए राजनीतिक वर्ग को ही दोषी मानता है। चौथा कारण है, व्यवस्था में उच्च स्थानों पर बढ़ते भ्रष्टाचार व अनियमितताओं के मामले। पांचवां कारण है, सुरक्षा के विशेषाधिकार के मामले को लेकर युवा पीढ़ी की नाराजगी। वह यह मानती है कि विशिष्ट लोगों की सुरक्षा व्यवस्था तो मजबूत है, लेकिन जनता के लिए नाम के भी पुलिसकर्मी उपलब्ध नहीं हैं।

सड़क पर सांसद व मंत्रियों की गाड़ियां चलती हैं, तो उनके साथ पूरा लाव—लश्कर होता है, लेकिन एक आम लड़की के साथ बस में सामूहिक बलात्कार की घटना घट जाती है। इस तरह से आज जो सड़कों पर गुस्सा दिख रहा है, वह कई मुद्दों पर सरकारी नाकामी की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है। बेशक इसकी शुरुआत बलात्कार की घटना से शुरू हुई, लेकिन इसमें कई तथ्य गुंधे हुए हैं। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पिछले कुछ समय में देश के मध्य वर्ग में बड़ा परिवर्तन आया है। जब मेरी किताब द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास (हिंदी में भारतीय मध्यवर्ग की अजीब दास्तां) प्रकाशित हुई थी, तब इस वर्ग की आबादी तीन करोड़ थी। लेकिन अब यह आबादी 19 करोड़ हो गई है।

जो ताजा आंकड़े उपलबध हैं वे बता रहे हैं कि 2015 तक यह आबादी 30 करोड़ हो जाएगी। अगर हम पूरे भारतीय मध्य वर्ग को जोड़कर देखें तो कई देशों की तो आबादी भी इतनी नहीं है। यह निर्णायक तबका है, जो व्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यह तबका टेलीविजन और अखबार में वहीं खबर देखता—पढ़ता है, उन्हीं सुविधाओं की मांग करता है, वहीं नौकरियां चाहता है, जो उसकी जरूरतों में शामिल है। जो उसके नुमाइंदे हैं, वे भी सरकार से उनके मुद्दों पर ही बातचीत करते हैं। ऐसे में, यह तबका, जाति, रंग, धर्म, मत—संप्रदाय में नहीं बंटा है, बल्कि अपनी लिए एकजुट हो चुका है।

इसके अलावा देश में मोबाइल क्रांति आ चुकी है। न केवल मोबाइल फोन उपभोक्ताओं की तादाद बढ़ी है, बल्कि इसके इस्तेमाल के कई विकल्प भी उपभोक्ताओं के सामने आए हैं। इसके अलावा, फिलहाल यह सुविधा भारत में काफी सस्ती भी है। इसका सबसे बड़ा फायदा इस तबके को यह मिला है कि वह किसी घटना के बाद एक—दूसरे से तुरंत जुड़ रहा है। तकनीक भी इसमें सहायक हो रही है। एक एसएमएस किया जाता है, और वह आधे घंटे के अंदर पांच लाख लोगों तक पहुंच जाता है।

इसलिए आपने देखा कि बहुत जल्दी लोग इंडिया गेट जैसे सार्वजनिक स्थानों पर एकत्र हो जाते हैं। फिर टेलीविजन क्रांति या इलेक्ट्रॉनिक क्रांति का भी इस पर काफी असर पड़ रहा है। फिलहाल देश में सौ से ज्यादा टेलीविजन चैनल हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तो बाढ़ है। नतीजतन जो घटना दिल्ली में घटती है, वह चेन्नई तक दिख जाती है और उसका प्रतिरोध असम में जाकर दिखता है। कंप्यूटर और इंटरनेट ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। अभी कुछ ही समय पहले अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ था। हालांकि, यह आंदोलन बाद में जाकर किस मुकाम पर पहुंच गया, यह एक अलग मुद्दा है। परंतु इस आंदोलन ने मध्य वर्ग, उसमें खासकर युवा वर्ग को संगठित करने का काम किया है। इससे पहले जेसिका लाल हत्याकांड के बाद लोगों ने मोमबत्तियां जलाई थीं और सड़कों पर विरोध—प्रदर्शन हुआ था। लेकिन उसमें मध्यवर्ग के सीमित लोग ही शामिल हुए थे।

उस छोटी—सी शुरुआत को अन्ना हजारे ने जंतर—मंतर पर एक बहुत बड़ा आकार दे दिया। शायद इसलिए जो मध्य वर्ग कल तक अपनी जरूरतों के आधार पर घर से बाहर निकलता था, आज सड़क पर उतरा हुआ है। सरकार की समस्या यह है कि वह इस जन अक्रोश को हाल ही में हुई बलात्कार की वारदात से जोड़कर ले रही है। इस आधार पर सरकार ने कईं मांगें मान मान लेने के संकेत दिए हैं, मसलन, बलात्कार के मामले में दंड को बढ़ाने का प्रावधान, फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन और सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती। लेकिन इससे भी आक्रोश कम होता नहीं दिख रहा है, क्योंकि ये मांगें कहीं न कहीं बड़ी मांगों से जुड़ रही हैं।

मामला लोकपाल और न्यायिक सुधार तक जा पहुंचता है। यह स्थिति समाज में तब आती है, जब अपराध और सजा के बीच का फासला बढ़ जाता है। इसलिए मौजूदा जन आक्रोश को विस्तृत दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। कुछ बदलावों से समस्या का हल नहीं निकलेगा। त्वरित फायदे तो होंगे, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। स्थायी समाधान के लिए कुछ नए कदम उठाने होंगे। पहला, जनता से जुड़े तमाम विधेयकों को जल्द से जल्द संसद में पारित करना होगा। इसमें लोकपाल, व्हिसिल ब्लोअर प्रोटेक्शन, महिला आरक्षण जैसे विधेयक शामिल हैं। दूसरा, अति सुरक्षित जगहों की परिभाषा बदलनी होगी।

मसलन, नई दिल्ली और बाकी दिल्ली के बीच के अंतर को खत्म करना होगा। तीसरा, देश भर में बलात्कार जैसे अपराधों के खिलाफ तुरंत फैसले देने होंगे। फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की बात सरकार ने मान ली है। लेकिन पहले ही 1741 फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित हो चुके हैं। इसलिए बेहतर होगा कि संसद का विशेष सत्र बुलाकर तमाम सुधारों पर एक साथ काम किया जाए। अधूरे सुधारों से जन आक्रोश नहीं थमेगा नहीं, वह रह—रहकर उमड़ता रहेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

 
 
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