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सब खेतों को पानी देने के लिए बदलनी होगी नीति
भारत डोगरा, सामाजिक कार्यकर्ता First Published:23-12-12 07:06 PM

सिंचाई को कृषि विकास के लिए सबसे जरूरी माना गया है, पर देश की सिंचाई व्यवस्था गंभीर समस्याओं से घिरी है। आंकड़े बताते हैं कि 1991-92 से अब तक करीब दो लाख करोड़ रुपये खर्च होने के बाद भी बड़ी व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं से होने वाली सिंचाई नहीं के बराबर बढ़ी है।

मौजूदा सिंचाई परियोजनाओं में एक बड़ी समस्या तो भ्रष्टाचार की है। केवल महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार का अनुमान हजारों करोड़ रुपये का है। इसके कारण न केवल परियोजनाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ता है, बल्कि कई अनुचित योजनाओं को भी तमाम दुष्परिणामों व खतरों की आशंका के बावजूद अपना लिया जाता है। ऐसी परियोजनाओं के कारण लाखों लोगों का बेवजह विस्थापन होता है। कई बार नदियों के प्रवाह पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। इस तरह की महंगी व बड़ी परियोजनाओं के स्थान पर ऐसी लघु सिंचाई व वाटरशेड परियोजनाओं के लिए बजट उपलब्ध होना चाहिए, जो चेक डैम, बंधीकरण, तालाब निर्माण व मरम्मत आदि उपायों से ‘खेत का पानी खेत में व गांव का पानी गांव में’ रोकने पर आधारित हों।

इनमें या तो विस्थापन होता ही नहीं है या इसे गांववासी अपने स्तर पर नियोजन से न्यूनतम कर सकते हैं। प्राय: नदी से पानी बड़े पैमाने पर हटाने की भी जरूरत नहीं पड़ती, जिससे नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बना रहता है। ऐसी परियोजना दो-तीन वर्षो में ही अच्छा लाभ देने लगती है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि ऐसी परियोजनाओं को निर्धन वर्ग खासकर दलित व आदिवासी किसानों के कल्याण से जोड़ा जाए।

जिन स्थानों पर वाटरशेड का कार्य ईमानदारी से किया गया है व विशेषकर कमजोर वर्ग को लाभ दिलाने के लिए उसमें भूमि वितरण सुनिश्चित करने के कार्य को जोड़ा गया है, वहां के परिणाम उत्साहवर्धक हैं। इस तरह का मॉडल चित्रकूट जिले की मनगवां पंचायत में व बांदा जिले की नेरुआ पंचायत (उत्तर प्रदेश) में देखा जा सकता है। वहां ऐसे अनेक दलित व आदिवासी किसान हैं, जिनके घरों में पहली बार अपने खेतों का इतना अनाज आ सका है कि उनकी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो। जहां मनगंवा के आदिवासी पहले बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति में काम कर रहे थे व नेरुआ के दलित प्रवासी मजदूरी पर आश्रित हो चुके थे, वहां अब उनके पहले बंजर व वीरान पड़े खेतों पर हरी फसलें लहलहा रही हैं।

छोटी सिंचाई और वाटरशेड परियोजनाओं के लाभ जल्दी ही मिलने लगते हैं, जबकि बड़ी परियोजनाओं में बहुत लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है। इनमें तो स्थानीय लोगों की बहुत अच्छी भागीदारी होती है। इनमें पानी की फिजूलखर्ची और विस्थापन नहीं के बराबर होते हैं। मिट्टी व जल संरक्षण के हिसाब से भी यह जरूरी है। लेकिन बड़ी परियोजनाओं से अपने कई सारे हित साधने वाले क्या इस ओर ध्यान देंगे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 
 
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