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जागने वाले की रात लंबी
अमृत साधना
First Published:23-12-12 07:04 PM
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गौतम बुद्ध ने बहुत सरल उदाहरणों द्वारा गहरी बातें कही हैं। वे बातें इतनी सटीक हैं कि सीधे निशाने पर लगती हैं। जैसे एक गाथा में वह कहते हैं, ‘जागने वाले की रात लंबी होती है। थके हुए के लिए योजन लंबा होता है।’
रात वही है, लेकिन जब हम सोए होते हैं, तो रात छोटी मालूम पड़ती है। पता ही नहीं चलता कि रात कब गुजर गई। कोई प्रिय जन बीमार हो या कोई रोगी मरण शय्या पर हो, और हम उनके साथ बैठे हों, तो रात कटती ही नहीं। लगता है कि सवेरा कभी होगा ही नहीं। हमारे मनोभावों पर निर्भर है रात का लंबा या छोटा होना। यह बात रात पर ही लागू नहीं है, बल्कि पूरी जिंदगी पर लागू है। समय का माप कहीं भीतर हमारे मन में है। इसीलिए समय का माप सापेक्ष है। जब हम प्रसन्न होते हैं, समय जल्दी जाता है। जब दुखी होते हैं, समय धीरे-धीरे रेंगता है।

समय तो वही है, घड़ी की चाल वैसी ही है, किसी के सुख-दुख से नहीं बदलती, लेकिन समय के प्रति हमारा बोध बदल जाता है। अल्बर्ट आइंस्टाइन से किसी ने पूछा, ‘थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को सरल भाषा में समझाइए।’ आइंस्टाइन ने कहा, ‘जब आप प्रेमी के साथ बगीचे में बैठे होते हैं, तो लगता है कि समय बहुत जल्दी बीत रहा है। और जब आपको गरम तवे पर बिठा दिया जाए, तो एक-एक सेकंड एक युग की तरह मालूम होगा।’ मन के इस स्वभाव को देखते हुए ओशो हमें आगाह करते हैं, ‘जो आनंद से जीने का ढंग जानते हैं, उनकी जिंदगी की यात्रा रोशनी से भरपूर होती है।

जिन्होंने दुख में जीने की आदत बना ली है, उनकी जीवन-यात्रा स्याह रात हो जाती है। तुम अपने चारों तरफ जो अनुभव कर रहे हो, वह तुम पर निर्भर है। तुम ही उसके सजर्क हो। तुमने जो जिंदगी पाई है, वैसी जिंदगी पाने का तुमने उपाय किया है- जानकर या फिर अनजाने में। तुमने जो मांगा था, वही तुम्हें मिला है।’

 
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