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समय से बड़े नहीं हैं सचिन
शशि शेखर
shashi.shekhar@livehindustan.com
First Published:22-12-12 06:40 PM
2 अप्रैल, 2011, पल-दर-पल जवान होती रात में पूरे देश की धड़कनें तेजी से घट-बढ़ रही थीं। भारत विश्व कप के फाइनल में था। हर गेंद और शॉट के साथ उत्तेजना का पारा ऊपर-नीचे हो रहा था। कहने की जरूरत नहीं कि हम मैच जीत गए। उसके बाद जो हुआ, वह एक ऐतिहासिक लम्हे के गर्भ से निकला दूसरा इतिहास था। टीम के सदस्यों ने सचिन तेंदुलकर को कंधों पर उठा लिया और वे मैदान का चक्कर लगाने लगे। कप्तान धौनी भी उस समूह का हिस्सा थे। पूरे देश की ऐसी ही भावना थी। सचिन इस जीत के सबसे बड़े हकदार थे। तेंदुलकर की तमन्ना थी कि रिटायर होने से पहले उनकी टीम एक बार फिर विश्व कप जीत ले। उनका हक था इस भावांजलि पर। तभी यह सवाल भी उछला था कि क्या अब वह सक्रिय क्रिकेट से अवकाश लेंगे?
14 दिसंबर 2012, काल की घड़ी उलटी राह पर चल पड़ी थी। भारत-इंग्लैंड सीरीज के आखिरी टेस्ट में सचिन महज दो रन पर आउट हो गए। सिर झुकाए जब वह पवेलियन लौट रहे थे, देश के लाखों लोगों के मन को यह सवाल मथ रहा था कि हे भगवान, सचिन रिटायर क्यों नहीं हो जाते? हालात कितने बदल गए हैं? 2011 में जो लोग सचिन तेंदुलकर को विश्व विजेता टीम के कंधों पर सवार देखकर रोमांचित थे, जिन्हें तब उनके सौवें सैकड़े का इंतजार था, वे तक मायूस हो चले हैं। विश्व कप के बाद सचिन को सौवां शतक लगाने में एक साल चार दिन लग गए। हो सकता है कि अगले ही मैच में वह कोई नया रिकॉर्ड बना दें, पर उनके कीर्तिमानों की कितनी कीमत चुकाएगा यह देश? औरों की तरह मैं भी मानता हूं।
उनके रिकॉर्ड ऐसे जगमगाते लाइट हाउस बन गए हैं कि जब तक क्रिकेट रहेगा, तब तक इस खेल के दीवाने उनसे आलोक ग्रहण करते रहेंगे। हालांकि, सच यह भी है कि रिकॉर्ड कालजयी हो सकते हैं, पर मनुष्य नहीं। हम सब हाड़-मांस के बने हैं। काल और संयोग नायकों, खलनायकों, विदूषकों और यहां तक कि आम आदमी की जिंदगी में भी एक-सा चमत्कार दिखाते हैं। इसीलिए इस समय यह सवाल पूरी शिद्दत से उठ रहा है कि क्या मास्टर ब्लास्टर को रिटायर हो जाना चाहिए?
तेंदुलकर महान इसलिए हैं, क्योंकि उन्होंने इस तरह के आंकड़े गढ़े हैं, जिनकी कभी कल्पना नहीं की जा सकती थी। वह आज जहां हैं, उन्हीं आंकड़ों की वजह से हैं। अब अगर उन पर सवाल उठ रहे हैं, तो उसके पीछे भी इन्हीं आंकड़ों का अंकगणित है। उन्हें टेस्ट मैच में सेंचुरी ठोके दो साल होने को आए हैं। 23 महीने पहले जनवरी, 2011 में सचिन ने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपना आखिरी शतक लगाया था। उसके बाद से वे 31 पारियां खेल चुके हैं और खेल प्रेमी उनकी सेंचुरी का इंतजार कर रहे हैं। और तो और, पिछली 10 पारियों में वह अपवाद स्वरूप ही 50 का आंकड़ा छू सके हैं, जबकि उनका औसत 6.2 पारियों में एक शतक का रहा है। यह दिसंबर 2012 है। हो सकता है कि सचिन अगले टेस्ट मैच में ही कोई चमत्कार कर दें, पर यह सच है कि उनके लंबे कैरियर का यह सबसे बुरा वर्ष रहा है।
इस साल उन्होंने अब तक नौ टेस्ट मैच खेले हैं, जिनमें लगभग 23 की औसत से वह कुल 357 रन ही बना पाए हैं। इस महान बल्लेबाज की जिंदगी में 2003 और 2006 में भी ठहराव आया था, पर तब भी रनों का ऐसा सूखा नहीं पड़ा था, इसलिए बहस पुरगर्म है कि क्या अब खुद खेलने की बजाय उन्हें नौजवान पीढ़ी के लिए रास्ता साफ करना चाहिए? वह चाहें, तो अपना समूचा जीवन इस खेल की सेवा में लगा सकते हैं। क्यों नहीं सचिन कभी अपने प्रेरणास्रोत रहे सुनील मनोहर गावस्कर से कुछ सीख हासिल करते? 1986-87 उनका आखिरी सीजन था। उस दौरान उन्होंने अपने आखिरी दस टेस्ट मैचों में दो शतक और पांच अर्धशतक लगाए थे। औसत के लिहाज से सचिन के मौजूदा 23 के मुकाबले वह 58.27 पर थे।
गावस्कर ने बल्ला भले ही छोड़ा, पर वह आज भी मैदान में डटे हुए हैं, एक कमेंटेटर के तौर पर। सचिन क्यों नहीं उनसे प्रेरणा लेते? सौवां शतक लगाने के बाद उन्होंने कहा था, ‘जब आप शीर्ष पर हों, तो आपको देश की सेवा करनी चाहिए। जब मुझे ऐसा महसूस होगा कि मैं देश की सेवा करने की स्थिति में नहीं हूं, तब मैं संन्यास लूंगा, न कि तब, जब लोग कहने लगें। यह स्वार्थी बयान है कि शीर्ष पर रहते हुए रिटायर होना चाहिए।’ तब भी यह सवाल उठा था कि क्या देश की सेवा का अकेला तरीका सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट खेलना ही है? आज नहीं तो कल उन्हें रुखसत होना ही होगा। वह अपने आंकड़ों के साथ-साथ हिमालय जैसी गरिमा की मिसाल क्यों नहीं रचते?
वह अपने हर मैच के साथ टॉप से कुछ और नीचे खिसक जाते हैं। यही समय है, नई राह बनाने का। ऐसा नहीं कि उनके पास अवसर नहीं है। सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया है। उनके पास सांसद निधि है और देश में घूमने के लिए नि:शुल्क हवाई यात्रा का पास। वह चाहें, तो पूरे देश में सोई पड़ी क्रिकेट अकादमियों में नए प्राण फूंक सकते हैं। अब तक आरोप लगते रहे हैं कि सिनेमा, साहित्य और संस्कृति के नाम पर आजाद भारत की सरकारें जिन लोगों को राज्यसभा के लिए मनोनीत करती रही हैं, वे कोई कारगर भूमिका नहीं निभा सके हैं।
सचिन अपने पूर्ववर्तियों के इस कलंक को भी धो सकते हैं और आने वालों के लिए नए प्रतिमान भी गढ़ सकते हैं। एक बात और। उन्होंने ट्वंटी-20 क्रिकेट खेलना तो पहले से ही बंद कर रखा है, पर आईपीएल के फटाफट क्रिकेट से सचिन का नाता जुड़ा हुआ है। क्या महान लोगों के मन में भी इतनी धन पिपासा होती है? कहने की जरूरत नहीं है कि आईपीएल पैसे का खेल है, जबकि एकदिनी क्रिकेट आज भी देश को मान-सम्मान दिलाने की क्षमता रखते हैं। जिस विश्व कप की विजय के बाद लोग उन्हें कंधों पर उठाए घूम रहे थे, वह खुद इसका प्रमाण है। आरोप लगाने वाले कह सकते हैं कि मास्टर ब्लास्टर टेस्ट मैच इसलिए खेलना चाहते हैं, ताकि गांगुली की तरह उनका बाजार ठंडा न पड़ जाए।
ऐसा भी नहीं है कि देश की नौजवान पीढ़ी से अच्छे क्रिकेटर नहीं आ रहे हैं और मजबूरन हमें 40वें वर्ष की दहलीज पर खड़े सचिन पर दांव लगाना पड़ता है। जब नई पीढ़ी की उमंगें उछाल मार रही हों, तब बुजुर्गों का यह दायित्व बनता है कि वे उनके लिए सिंहासन खाली करें। कृपया इस लेख को पढ़ते समय यह मत सोच लीजिएगा कि मैं सचिन तेंदुलकर का विरोधी हूं। पूरे देश के क्रिकेट प्रेमियों के साथ मैंने भी उनकी शास्त्रीय बल्लेबाजी का आनंद उठाया है। वह जब 90 के बाद आउट हुए हैं, मैं स्तब्ध रह गया हूं और उनकी हर सेंचुरी पर दिल में बुलबुले फूटते महसूस किए हैं, पर इंसानियत का एक सच और भी है। अवतार जब अवतरित होते हैं, तो उन्हें अपनी रवानगी का तौर-तरीका खुद तय करना होता है। भूलें नहीं कि समय से बलवान कोई नहीं होता है।
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टिप्पणियाँ
टिप्पणियॉ पढ़े(2)
sachin ne jo 13 saal cricket ke liye diye hain uska unhone board se pagar bhi liya hai, har khiladi ki ek samay rahta hai, uske baad khel mein giravat aane lagta hai, sachcha khiladi to vo hai jo is baat ko samaz kar sanyas le le, gavaskar iske bemisal udaharan hain jab unhone sanyas liya tab ve aur 4 saal tak khel sakte the, aur sachin ko pehle hi sanyas le lena chahiye
By vivek jadhav (23rd-December-2012 07:01:PM)
सचिन के लिए क्रिकेट जिवन है। और कोई जिना कैसे छोर सकता है। हम सब अपने तरफ से सोचते कभि ये नही सोचते कि सचिन ने अपने जिवन के 23 साल दिए है।
By Navin singh (23rd-December-2012 09:40:AM)
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