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हिंदी की विनम्रता का वालमार्ट
सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार First Published:22-12-12 06:35 PM

हिंदी में जिसे देखो, वही अपना ‘विनम्र योगदान’ करता रहता है। हिंदी साहित्य सबके विनम्र योगदान से बना है। हिंदी में साहित्यकार योगी होता है। साहित्यकार मानता है कि उसका लेखन हिंदी को विनम्र योगदान है। दूसरे भी कहते हैं कि यह सब उन्हीं का विनम्र योगदान है।

हिंदी वाला स्वभाव से विनम्र होता है, स्वभाव से योगी होता है और स्वभाव से दानी भी होता है। विनम्र वही हो सकता है, जो विशेष रूप से नम्र हो। दान भी वही कर सकता है, जिसके पास देने को कुछ हो। हिंदी के रचनाकार के पास तो देने को बहुत कुछ होता है। वह दान करके पुण्य कमाता रहता है। इस मामले में कबीर ने लाइन दी है कि ‘दान किए धन ना घटे कह गए दास कबीर!’ इसे मानकर हिंदी वाला साहित्य को दान-पुण्य की चीज मानता है। वह जितना दान करता जाता है, उतना ही साहित्य बढ़ता जाता है। दान के ढूह यत्र-तत्र खड़े दिखते हैं। चुंगी वाले परेशान होते हैं कि इस कबाड़ का क्या करें?

‘योगदान’ में ‘योग’ बड़ा कूट पद है। ‘कूट’ का अर्थ है: ‘कूट-कूटकर भरा हुआ।’ योग मतलब ‘जोड़-तोड़, कुल जमा, कुल मिलाकर। आजकल हिंदी में योग का मतलब ‘जोड़तोड़’ से लिया जाता है। जोड़तोड़ से ‘जुगाड़’ बनता है। हिंदी में हर कोई अपना जुगाड़ करता रहता है। साहित्य के विनम्रभाव ने हिंदी के पाठक श्रोता का स्वभाव भी विनम्र बना डाला है। इसी कारण हिंदी वाले बिना किसी शेरशराबे और उत्तेजना के तीन चार घंटे शांतिपूर्वक आदर्श श्रोता बनकर योगदान करते रहते हैं। उनकी विनम्रता के निर्माण में फ्री के चाय और नाश्ते का विनम्र योगदान रहता है। जब कोई श्रोता बोर होकर कसमसाता है तभी संयोजक उसे सावधान कर कहता है कि आप जब अब तक विनम्र रहे हैं तो आगे भी विनम्र रहेंगे ऐसी अपेक्षा की जाती है। इसके बाद मजाल कि कोई अपनी विनम्रता का त्याग कर दे। हिंदी का हर आदमी इसी कारण विनम्र होता है।

किसी की कविता की चोरी भी विनम्रभाव से की जाती है। सीना जोरी भी विनम्र होती है। सत्ता को विनम्र भाव से धिक्कारा जाता है। प्रकाशक को गाली विनम्र भाव से दी जाती है। लेखक विनम्र भाव से एक दूसरे को नीचा दिखाते रहते हैं। साहित्य में लड़कियां भी विनम्रता से छेड़ी जाती हैं। एक साहित्यकार कितनी स्त्रियों के साथ सोया है? यह बात भी वह विनम्रता से बताता है और सब साहित्यकारों का विनम्र योगदान देखें कि वे इस लंपटता का प्रतिवाद तक नहीं करते! और अधिक क्या कहें? अपनी हिंदी का डीएनए ही कुछ विनम्र है।

हिंदी साहित्य ‘विनम्रता का वालमार्ट’ है। यहां बहुत जगह है। आप चाहें तो अपना कूड़ा कबाड़ विनम्रतापूर्वक रख जाएं। हम उसे आपका योगदान कहेंगे। आप अपनी बदतमीजियों और हिमाकतों का विनम्रतापूर्वक योगदान करें या ट्रक भर कर अपनी अवसरवादिता का या लफंगई का योगदान करें। हम पूजेंगे। विनम्रता के वालमार्ट में सब अपने अपने बोरे रख कर चले जाते हैं साहित्य का जिसका न कोई भूत है, न वर्तमान, न भविष्य वह भी अपना योगदान करके जा सकता है। नो टैक्स! सब फ्री! त्वदीयं वस्तु गोविंदम् तुभ्यमेव समर्पये। यह विनम्रता का ‘यूज एंड थ्रो’ कल्चर है। योगदानकर्ता कहता है: मेरा मुझमें कुछ नहीं जो कुछ है सो तोरा- तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोरा। बताइए हिंदी का विनम्र कूड़ा किस तरह साफ हो!

 
 
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